
गोवा में राफेल मरीन की गर्जना! INS विक्रांत से कैसे बढ़ेगी भारतीय नौसेना की ताकत और क्यों बढ़ेगी दुश्मनों की बेचैनी?
भारतीय नौसेना गोवा में अत्याधुनिक राफेल मरीन लड़ाकू विमान का उड़ान परीक्षण कर रही है। करीब 63,000 करोड़ रुपये के समझौते के तहत फ्रांस से खरीदे जाने वाले 26 राफेल मरीन विमान INS विक्रांत और INS विक्रमादित्य की युद्धक क्षमता बढ़ाएंगे।

LIVE 24 TV | विशेष रिपोर्ट | 22 अक्टूबर 2026
नई दिल्ली/गोवा। भारतीय नौसेना अपनी समुद्री युद्धक क्षमता को नई ऊंचाई देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा रही है। गोवा स्थित नौसेना के आईएनएस हंसा एयरबेस पर फ्रांस निर्मित अत्याधुनिक राफेल मरीन (Rafale-M) लड़ाकू विमान का उड़ान परीक्षण किया जा रहा है। इसका उद्देश्य विमान को भारत के स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत से सुरक्षित और प्रभावी ढंग से संचालित करने की तकनीकी तैयारियों की जांच करना है। रक्षा अधिकारियों के अनुसार, ये परीक्षण भविष्य में राफेल मरीन को भारतीय विमानवाहक पोतों पर तैनात करने की दिशा में अहम हैं।
गोवा में क्यों हो रहा है राफेल मरीन का परीक्षण?
गोवा के आईएनएस हंसा में स्थित तट-आधारित परीक्षण केंद्र भारतीय विमानवाहक पोतों की उड़ान व्यवस्था जैसा वातावरण उपलब्ध कराता है। आईएनएस विक्रांत और आईएनएस विक्रमादित्य में लड़ाकू विमान स्की-जंप रैंप से उड़ान भरते हैं। उतरते समय विशेष स्टील के तार विमान की गति नियंत्रित करते हैं। इस प्रणाली को STOBAR कहा जाता है।
इसके विपरीत, फ्रांस का राफेल मरीन मुख्य रूप से कैटापॉल्ट प्रणाली वाले विमानवाहक पोतों के अनुरूप विकसित हुआ है। इसलिए भारतीय विमानवाहक पोतों से संचालन के लिए इसकी उपयुक्तता की पुष्टि आवश्यक है। परीक्षणों में उड़ान भरने की क्षमता, सुरक्षित वापसी, पोत के डेक पर विमान के संचालन और आवश्यक तकनीकी बदलावों का मूल्यांकन किया जा रहा है।
63,000 करोड़ रुपये की ऐतिहासिक रक्षा डील
भारत और फ्रांस ने 28 अप्रैल 2025 को लगभग 63,000 करोड़ रुपये के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत भारतीय नौसेना को कुल 26 राफेल मरीन विमान मिलेंगे। इनमें 22 एकल-सीट और चार दोहरी-सीट वाले विमान शामिल हैं। समझौते में हथियार, प्रशिक्षण, उड़ान सिम्युलेटर, तकनीकी उपकरण और रखरखाव सहायता भी शामिल है।
रक्षा अधिकारियों के हालिया बयानों के अनुसार, विमानों की आपूर्ति 2028 के अंत अथवा 2029 की शुरुआत में शुरू होने की उम्मीद है। हालांकि, शुरुआती सरकारी जानकारी में संपूर्ण आपूर्ति 2030 तक होने का उल्लेख था।

इस परीक्षण का सामरिक महत्व क्या है?
गोवा में चल रहा परीक्षण केवल एक लड़ाकू विमान की उड़ान तक सीमित नहीं है। यह भारतीय नौसेना की भविष्य की समुद्री युद्ध रणनीति से सीधे जुड़ा है। पहला महत्वपूर्ण उद्देश्य विमानवाहक पोतों से सुरक्षित संचालन सुनिश्चित करना है। समुद्र में सीमित स्थान वाले डेक से उड़ान भरना और वापस उतरना सामान्य हवाई अड्डे की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण होता है।
दूसरा उद्देश्य भारतीय नौसेना की मारक क्षमता बढ़ाना है। राफेल मरीन हवा से हवा और हवा से सतह पर हमला करने की क्षमता वाला बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान है। इससे दुश्मन के विमानों, युद्धपोतों और अन्य सैन्य ठिकानों के विरुद्ध अभियान चलाने की क्षमता मजबूत होगी।
तीसरा प्रमुख उद्देश्य विमानवाहक पोतों पर उपलब्ध स्थान का प्रभावी इस्तेमाल करना है। राफेल मरीन के पंख मुड़ते नहीं हैं, जबकि वर्तमान मिग-29के विमानों के पंख मोड़े जा सकते हैं। इसलिए पोत के डेक और हैंगर में इन विमानों की आवाजाही तथा भंडारण व्यवस्था का परीक्षण विशेष महत्व रखता है।
हिंद महासागर में मजबूत होगी भारत की स्थिति
हिंद महासागर भारत के व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस क्षेत्र में विभिन्न देशों की बढ़ती नौसैनिक गतिविधियों के बीच अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। राफेल मरीन की तैनाती से भारतीय नौसेना को समुद्र में दूर तक हवाई निगरानी, लड़ाकू सुरक्षा और आवश्यकता पड़ने पर त्वरित सैन्य कार्रवाई की बेहतर क्षमता मिलेगी।
विशेषज्ञों के अनुसार, आधुनिक विमानवाहक पोत और उन पर तैनात लड़ाकू विमान किसी भी देश की समुद्री शक्ति के महत्वपूर्ण आधार होते हैं।

आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी मिलेगा लाभ
राफेल मरीन समझौते में भारतीय हथियारों के एकीकरण के लिए प्रौद्योगिकी हस्तांतरण का प्रावधान शामिल है। साथ ही देश में रक्षा उपकरणों के निर्माण, मरम्मत और रखरखाव संबंधी सुविधाओं को विकसित करने की योजना भी है।
इससे भारतीय रक्षा उद्योग, सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों और कुशल तकनीकी कर्मचारियों के लिए नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है।
नौसेना की भविष्य की तैयारी में महत्वपूर्ण कदम
भारतीय नौसेना अभी विमानवाहक पोतों से मिग-29के लड़ाकू विमानों का संचालन करती है। राफेल मरीन की खरीद से उसके विमानवाहक आधारित लड़ाकू बेड़े को आधुनिक बनाने में मदद मिलेगी।
गोवा में चल रहे परीक्षण की सफलता तय करेगी कि राफेल मरीन भारतीय विमानवाहक पोतों की विशिष्ट उड़ान व्यवस्था के साथ कितनी प्रभावी ढंग से काम कर सकेगा। यह परीक्षण हिंद महासागर में भारत की हवाई और समुद्री सुरक्षा क्षमता को मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण तकनीकी पड़ाव है।
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