
UGC के नए नियमों पर भाजपा की बढ़ी राजनीतिक चुनौती, सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने दिए पुनर्विचार के संकेत
नियमों में समान अवसर सुनिश्चित करने, शिकायत निवारण तंत्र विकसित करने, इक्विटी कमेटी बनाने और निगरानी व्यवस्था स्थापित करने जैसे प्रावधान शामिल थे।जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा में SC, ST और OBC समुदायों के सदस्यों के साथ होने वाले भेदभाव को विशेष रूप से शामिल किया गया।

LIVE 24 TV | विशेष रिपोर्ट | नई दिल्ली, 6 नवंबर 2026
नई दिल्ली। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए समानता संबंधी नियम केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक चुनौती बन गए हैं। उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से लाए गए इन नियमों पर सामान्य वर्ग के कुछ संगठनों की आपत्तियों और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के हितों की सुरक्षा के सवाल ने विवाद को जटिल बना दिया है।
इस बीच 5 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने बताया कि वह UGC के 2026 के नियमों की समीक्षा के लिए एक समिति गठित करने पर विचार कर रही है। हालांकि समिति के गठन या नियमों को वापस लेने का अंतिम फैसला सामने नहीं आया है।
क्या हैं UGC के नए नियम?
UGC ने 13 जनवरी 2026 को Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 अधिसूचित किए थे। इनका उद्देश्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में भेदभाव की शिकायतों के समाधान के लिए संस्थागत व्यवस्था मजबूत करना था।
नियमों में समान अवसर सुनिश्चित करने, शिकायत निवारण तंत्र विकसित करने, इक्विटी कमेटी बनाने और निगरानी व्यवस्था स्थापित करने जैसे प्रावधान शामिल थे।जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा में SC, ST और OBC समुदायों के सदस्यों के साथ होने वाले भेदभाव को विशेष रूप से शामिल किया गया। इसी परिभाषा और शिकायत निवारण संबंधी कुछ व्यवस्थाओं पर कानूनी सवाल उठाए गए।
सामान्य वर्ग के संगठनों ने क्यों जताई आपत्ति?
नए नियमों के विरोध में सामान्य वर्ग के कुछ छात्र संगठनों और सामाजिक समूहों ने प्रदर्शन किए। विरोध करने वालों की प्रमुख आपत्ति यह थी कि जाति-आधारित भेदभाव की विशेष परिभाषा में सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों को समान संरक्षण नहीं मिलता।याचिकाकर्ताओं ने नियमों की भाषा स्पष्ट नहीं होने और शिकायतों के संभावित दुरुपयोग की आशंका भी जताई।दूसरी ओर, दलित और ओबीसी समुदायों के कुछ संगठनों ने नियमों पर रोक और उन्हें वापस लेने की संभावना का विरोध किया। उनके लिए शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव के खिलाफ प्रभावी संरक्षण एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।
भाजपा के भीतर भी उठे सवाल
UGC नियमों पर विवाद का राजनीतिक असर विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में देखने को मिला है। इंडियन एक्सप्रेस की 6 नवंबर की रिपोर्ट के अनुसार, नियमों के विरोध में भाजपा के कुछ स्थानीय पदाधिकारियों ने इस्तीफे दिए थे।प्रयागराज में भी इस मुद्दे पर राजनीतिक विवाद सामने आया। हालांकि भाजपा के कुछ विधायकों का कहना है कि अब जमीन पर असंतोष कम हुआ है और आगामी विधानसभा चुनाव में इसका बड़ा असर होने की आशंका नहीं है।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने भी नियमों को असंतुलित बताते हुए कहा कि आगे लिया जाने वाला फैसला संतुलित होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों लगाई रोक?
29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने UGC के नए नियमों के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी थी।मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कुछ प्रावधानों की अस्पष्टता और उनके संभावित दुरुपयोग को लेकर प्रारंभिक चिंता व्यक्त की थी। अदालत ने यह भी कहा कि नए नियमों पर रोक के दौरान UGC के 2012 के नियम लागू रहेंगे।यह अंतरिम आदेश है। अदालत ने अभी 2026 के नियमों की संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला नहीं सुनाया है।
5 नवंबर की सुनवाई में क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार की ओर से बताया कि नियमों की समीक्षा के लिए समिति बनाने पर विचार किया जा रहा है।अदालत ने विद्यार्थियों के सभी वर्गों के हितों की रक्षा पर जोर दिया। इसके बाद मामले की सुनवाई चार सप्ताह के लिए स्थगित कर दी गई।केंद्र सरकार की ओर से प्रस्तुत रुख से संकेत मिलता है कि नियमों में आवश्यक बदलावों पर विचार हो सकता है, लेकिन अभी न तो नियम वापस लिए गए हैं और न ही संशोधित नियम लागू हुए हैं।
2027 के चुनाव से पहले क्यों महत्वपूर्ण है विवाद?
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। ऐसे में UGC नियमों को लेकर विभिन्न सामाजिक समूहों की प्रतिक्रिया राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।भाजपा के सामने एक ओर सामान्य वर्ग के असंतुष्ट समूहों की चिंताओं को संबोधित करने की चुनौती है, तो दूसरी ओर SC, ST और OBC समुदायों के लिए भेदभाव-विरोधी संरक्षण सुनिश्चित करने का सवाल भी है।हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि विवाद का चुनावी परिणामों पर कितना असर पड़ेगा। इस संबंध में किसी व्यापक मतदाता सर्वेक्षण का प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल केंद्र सरकार की संभावित समीक्षा समिति, UGC की आगामी कार्रवाई और सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर नजर रहेगी।इस मामले का मूल प्रश्न केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि यह भी है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव के खिलाफ प्रभावी व्यवस्था कैसे बनाई जाए, जिसमें शिकायतकर्ताओं को न्याय मिले और सभी विद्यार्थियों के अधिकारों तथा निष्पक्ष प्रक्रिया की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो।




