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एशियाई पैरा खेल 2026 में एक ही स्पर्धा में भारत को स्वर्ण और रजत, मोना अग्रवाल ने बनाया नया रिकॉर्ड, अवनि लेखरा दूसरे स्थान पर

प्रतियोगिता के पहले दिन सोमवार, 19 अक्टूबर को महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफल एसएच1 स्पर्धा में भारत की मोना अग्रवाल ने स्वर्ण पदक जीता, जबकि दो बार की पैरालंपिक स्वर्ण पदक विजेता अवनि लेखरा ने रजत पदक अपने नाम किया।

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एशियाई पैरा खेल 2026 में एक ही स्पर्धा में भारत को स्वर्ण और रजत, मोना अग्रवाल ने बनाया नया रिकॉर्ड, अवनि लेखरा दूसरे स्थान पर

नई दिल्ली | 19 अक्टूबर 2026

जापान के आइची-नागोया में आयोजित एशियन पैरा गेम्स 2026 में भारतीय खिलाड़ियों ने शानदार शुरुआत की है। महिला 10 मीटर एयर राइफल एसएच1 स्पर्धा में मोना अग्रवाल ने 250.0 अंकों के नए गेम्स रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण पदक जीता, जबकि दो बार की पैरालंपिक स्वर्ण पदक विजेता अवनि लेखरा ने 249.6 अंकों के साथ रजत पदक हासिल किया। महज 0.4 अंक के अंतर से तय हुए मुकाबले में भारत ने पहले दो स्थानों पर कब्जा जमाया। वहीं, पैरा जूडो में भी भारतीय खिलाड़ियों ने पदक जीतकर देश का गौरव बढ़ाया।

निशानेबाजी में भारत का शानदार आगाज, एक साथ दो पदक

जापान के आइची-नागोया में सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 को एशियन पैरा गेम्स में भारतीय निशानेबाजों ने ऐतिहासिक प्रदर्शन किया। राजस्थान की मोना अग्रवाल और अवनि लेखरा ने महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफल स्टैंडिंग एसएच1 स्पर्धा में क्रमशः स्वर्ण और रजत पदक जीतकर भारत का पदक खाता खोला।

इस मुकाबले में दोनों भारतीय निशानेबाजों के बीच जबरदस्त प्रतिस्पर्धा देखने को मिली। मोना अग्रवाल ने शानदार वापसी करते हुए अंतिम दौर में बाजी पलट दी और 250.0 अंकों के साथ पहला स्थान हासिल किया। अवनि लेखरा 249.6 अंकों के साथ दूसरे स्थान पर रहीं। दक्षिण कोरिया की ली यूनरी ने कांस्य पदक जीता। मोना ने अपने प्रदर्शन से एशियन पैरा गेम्स का नया रिकॉर्ड भी स्थापित किया। इससे पहले 249.6 अंकों का रिकॉर्ड अवनि लेखरा के नाम था।

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अंतिम शॉट तक चला स्वर्ण पदक का रोमांच

फाइनल मुकाबले में शुरुआत से ही अवनि लेखरा मजबूत स्थिति में दिखाई दीं। उन्होंने शुरुआती सीरीज में बढ़त बनाई, लेकिन मोना अग्रवाल ने दबाव के बावजूद शानदार निशानेबाजी जारी रखी।

अंतिम शॉट से ठीक पहले दोनों खिलाड़ियों के अंकों में केवल 0.1 का अंतर था। मोना 239.2 अंक और अवनि 239.1 अंक पर थीं। निर्णायक शॉट के बाद मोना ने अपनी बढ़त बढ़ाकर 0.4 अंक कर ली और स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया। इस तरह भारतीय निशानेबाजों ने एक ही स्पर्धा में पहले और दूसरे स्थान पर रहकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का परचम लहराया।

एशियाई पैरा खेल 2026 में स्वर्ण पदक जीतने वाली मोना अग्रवाल और रजत पदक विजेता अवनि लेखरा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के आधिकारिक एक्स खाते के माध्यम से बधाई दी।


नौ महीने की उम्र में पोलियो, फिर भी नहीं छोड़ा संघर्ष का रास्ता

स्वर्ण पदक विजेता मोना अग्रवाल का जीवन चुनौतियों और संघर्षों से भरा रहा है। राजस्थान के सीकर में 8 नवंबर 1987 को जन्मीं मोना अग्रवाल महज नौ महीने की उम्र में पोलियो से प्रभावित हो गई थीं।मोना को महज नौ महीने की उम्र में पोलियो हो गया था, जिससे उनके दोनों पैर प्रभावित हुए। इसके कारण उनके दोनों पैरों की शारीरिक क्षमता प्रभावित हुई। हालांकि, उन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद खेलों में अपनी पहचान बनाने का संकल्प लिया।

उन्होंने अपनी शारीरिक चुनौती को अपने सपनों के रास्ते की बाधा नहीं बनने दिया। बचपन से ही खेलों के प्रति रुचि रखने वाली मोना ने अलग-अलग खेलों में अपनी प्रतिभा आजमाई।

निशानेबाजी में आने से पहले उन्होंने शॉटपुट, डिस्कस थ्रो, भाला फेंक और पैरा पावरलिफ्टिंग जैसी स्पर्धाओं में हिस्सा लिया। इसके अलावा वह सिटिंग वॉलीबॉल में भी सक्रिय रहीं और राजस्थान की महिला टीम की कप्तानी कर चुकी हैं।

वर्ष 2021 में उन्होंने इस खेल को गंभीरता से अपनाया और कुछ ही वर्षों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना ली। वर्ष 2024 के पेरिस पैरालंपिक में उन्होंने कांस्य पदक जीता था। अब एशियन पैरा गेम्स 2026 में स्वर्ण पदक हासिल करके उन्होंने अपने खेल करियर में एक और बड़ी उपलब्धि जोड़ ली है।

मोना ने वर्ष 2016 में पैरा एथलेटिक्स से खेल करियर शुरू किया। उन्होंने गोला फेंक, चक्का फेंक और भाला फेंक में हिस्सा लिया। इसके बाद पैरा पावरलिफ्टिंग और सिटिंग वॉलीबॉल में भी अपनी प्रतिभा दिखाई। वर्ष 2019 में मोना राजस्थान की महिला सिटिंग वॉलीबॉल टीम की कप्तान रहीं और टीम को राष्ट्रीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक दिलाया।

मोना ने दिसंबर 2021 में लगभग 34 वर्ष की उम्र में निशानेबाजी शुरू की। जयपुर की एकलव्य स्पोर्ट्स शूटिंग अकादमी में उन्होंने प्रशिक्षण लिया। वर्ष 2022 में राष्ट्रीय स्तर पर रजत पदक जीता और 2023 में अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सफलता हासिल की।

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कार दुर्घटना में रीढ़ की हड्डी को चोट, अवनि ने बनाया विश्व स्तर पर नाम

भारत की स्टार पैरा निशानेबाज अवनि लेखरा की सफलता की कहानी भी असाधारण है।

वर्ष 2012 में एक कार दुर्घटना के दौरान अवनि की रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट लगी थी। इस दुर्घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और खेलों में अपना भविष्य बनाने का निर्णय लिया। इसके बाद अवनि ने निशानेबाजी का प्रशिक्षण शुरू किया और कठिन परिश्रम के दम पर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सफलता हासिल की।

टोक्यो पैरालंपिक में स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने भारतीय खेल इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया। पेरिस पैरालंपिक 2024 में भी उन्होंने स्वर्ण पदक जीता और लगातार दो पैरालंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाली भारत की प्रमुख पैरा खिलाड़ियों में अपनी जगह मजबूत की।

एशियन पैरा गेम्स के पिछले संस्करण में भी अवनि ने स्वर्ण पदक जीता था। इस बार वह स्वर्ण से केवल 0.4 अंक पीछे रह गईं, लेकिन उनका रजत पदक भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण उपलब्धि रहा।

अवनि ने वर्ष 2015 में लगभग 13 वर्ष की उम्र में निशानेबाजी शुरू की। उनके पिता उन्हें गर्मियों की छुट्टियों में शूटिंग रेंज ले गए थे। शुरुआत में यह केवल एक शौक था, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने इसे अपना करियर बना लिया। ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता अभिनव बिंद्रा की आत्मकथा से भी उन्हें प्रेरणा मिली।

लगातार अभ्यास और मेहनत के बल पर अवनि ने टोक्यो पैरालंपिक 2020 (आयोजन 2021) में 10 मीटर एयर राइफल एसएच1 स्पर्धा में स्वर्ण और 50 मीटर राइफल थ्री पोजीशन में कांस्य पदक जीता। इसके बाद पेरिस पैरालंपिक 2024 में एक और स्वर्ण पदक जीतकर वह दो पैरालंपिक स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं।

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पैरा जूडो में कोकिला ने जीता रजत पदक

निशानेबाजी के साथ-साथ पैरा जूडो में भी भारतीय खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन किया। भारत की कोकिला ने महिलाओं के जे2 वर्ग की 52 किलोग्राम भार श्रेणी में रजत पदक जीता। उन्होंने सेमीफाइनल में चीन की मौजूदा विश्व चैंपियन यी लियू को हराकर फाइनल में जगह बनाई थी।

फाइनल में उनका मुकाबला किर्गिस्तान की ऐबिके उलानबेक किजी से हुआ। हालांकि, खिताबी मुकाबले में कोकिला को हार का सामना करना पड़ा और उन्हें रजत पदक मिला।

कोकिला ने पिछले एशियन पैरा गेम्स में 48 किलोग्राम वर्ग में कांस्य पदक जीता था। इस बार रजत पदक हासिल करके उन्होंने अपने पिछले प्रदर्शन में सुधार किया और भारतीय पैरा जूडो के लिए एक महत्वपूर्ण सफलता दर्ज की।

कोकिला ने कब शुरू किया था जूडो खेलना?

भारतीय पैरा जूडो खिलाड़ी कोकिला कौशिक ने वर्ष 2018 में लगभग 14 वर्ष की उम्र में जूडो खेलना शुरू किया था। उनकी बड़ी बहन सफलता शर्मा जूडो का अभ्यास करती थीं। बहन को खेलते देखकर कोकिला की भी इस खेल में रुचि पैदा हुई।

कोकिला ने अपने माता-पिता के सामने जूडो सीखने की इच्छा जताई। परिवार ने उनका उत्साह बढ़ाया और प्रशिक्षण की व्यवस्था की। इसके बाद कोकिला ने नियमित अभ्यास शुरू किया और धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में अपनी पहचान बनाई।

हरियाणा के साधारण परिवार से अंतरराष्ट्रीय मंच तक का सफर

कोकिला मूल रूप से हरियाणा के जींद जिले के कासून गांव की रहने वाली हैं। उनका परिवार हिसार में रहता है। उनके पिता कृष्ण कुमार कौशिक शिक्षक हैं, जबकि मां सुमन शर्मा सामाजिक कार्यों से जुड़ी हैं।

दृष्टिबाधिता के बावजूद कोकिला ने खेलों में आगे बढ़ने का संकल्प लिया। परिवार के सहयोग और प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन में उन्होंने जूडो की तकनीकें सीखीं। कोकिला ने राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में लगातार अच्छा प्रदर्शन किया। अगस्त 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, वह तब तक राष्ट्रीय स्तर पर आठ स्वर्ण पदक जीत चुकी थीं।

एशियाई पैरा खेल 2026 में विश्व चैंपियन को हराकर फाइनल में पहुंचीं

जापान के आइची-नागोया में आयोजित एशियाई पैरा खेलों में सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 को कोकिला ने महिलाओं की जे2 श्रेणी के 52 किलोग्राम भार वर्ग में रजत पदक हासिल किया।

सेमीफाइनल में उन्होंने चीन की मौजूदा विश्व चैंपियन यी लियू को हराकर बड़ा उलटफेर किया। हालांकि, स्वर्ण पदक मुकाबले में किर्गिस्तान की एबिके उलानबेक काइजी ने उन्हें 21 सेकंड में इप्पोन के जरिए हरा दिया। इस हार के बावजूद कोकिला ने रजत पदक जीतकर भारत की पदक संख्या में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

कोकिला ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता हासिल करने के लिए लखनऊ स्थित भारतीय पैरा जूडो अकादमी में प्रशिक्षण लिया। प्रशिक्षक मुनव्वर अंजार के मार्गदर्शन में उन्होंने अपनी तकनीक और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बेहतर की। मई 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, कोकिला लगभग तीन वर्षों से लखनऊ में रहकर प्रशिक्षण ले रही थीं।

वर्ष 2024 के पेरिस पैरालंपिक में कोकिला ने महिलाओं के 48 किलोग्राम जे2 वर्ग में भाग लिया था। हालांकि वह पदक नहीं जीत सकीं, लेकिन उन्हें दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने का अनुभव मिला।

इसके बाद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपना प्रदर्शन बेहतर किया और एशियाई पैरा खेल 2026 में रजत पदक हासिल किया। कोकिला की सफलता भारतीय पैरा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा है। वर्ष 2018 में जूडो शुरू करने वाली इस खिलाड़ी ने आठ वर्षों के भीतर एशियाई स्तर पर अपनी मजबूत पहचान बना ली है।

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कपिल परमार ने कांस्य पदक जीतकर बढ़ाया देश का मान

पुरुषों की पैरा जूडो स्पर्धा में भारत के कपिल परमार ने भी शानदार प्रदर्शन करते हुए कांस्य पदक जीता। कपिल ने पुरुषों के जे1 वर्ग की 70 किलोग्राम भार श्रेणी में इंडोनेशिया के राफली अहनाफ शिदकी को हराया। उन्होंने महज एक मिनट नौ सेकंड में इप्पोन के जरिए मुकाबला अपने नाम किया।

इससे पहले कपिल को सेमीफाइनल में इंडोनेशिया के जुनैदी के खिलाफ हार झेलनी पड़ी थी। हालांकि, उन्होंने कांस्य पदक मुकाबले में शानदार वापसी की। कपिल परमार इससे पहले पेरिस पैरालंपिक 2024 में भी कांस्य पदक जीत चुके हैं। एशियन पैरा गेम्स में उनका यह प्रदर्शन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी निरंतर सफलता को दर्शाता है।

कपिल परमार ने कब शुरू किया था जूडो खेलना?

कपिल परमार को बचपन से ही खेलों में दिलचस्पी थी। उन्होंने कम उम्र में जूडो खेलना शुरू किया था, लेकिन पारिवारिक परिस्थितियों के कारण शुरुआती दौर में इसे नियमित रूप से जारी नहीं रख पाए। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, वह वर्ष 2014 से जूडो से जुड़े थे, जबकि 2017 में उन्होंने प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन में व्यवस्थित अभ्यास शुरू किया।

वर्ष 2017 में उनकी मुलाकात मध्य प्रदेश ब्लाइंड जूडो एसोसिएशन से जुड़े प्रशिक्षक भगवान दास से हुई। इसके बाद उन्होंने दृष्टिबाधित खिलाड़ियों के लिए जूडो का नियमित प्रशिक्षण लेना शुरू किया।

बिजली का करंट लगने से प्रभावित हुई आंखों की रोशनी

कपिल परमार मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के एक साधारण परिवार से आते हैं। बचपन में खेत में पानी की मोटर से जुड़े बिजली के तार के संपर्क में आने से उन्हें जोरदार करंट लगा था। इस दुर्घटना के बाद वह गंभीर रूप से घायल हो गए और लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहे। उनके भाई के अनुसार, वह करीब छह महीने तक कोमा में रहे। दुर्घटना के कारण उनकी आंखों की रोशनी बुरी तरह प्रभावित हुई।

स्वास्थ्य में सुधार के बाद कपिल ने हार मानने के बजाय खेलों के माध्यम से अपनी जिंदगी को नई दिशा देने का फैसला किया। जूडो में उनके प्रशिक्षण के दौरान प्रशिक्षकों ने स्पर्श और शारीरिक गतिविधियों के माध्यम से उन्हें तकनीकें सिखाईं।

19 अक्टूबर 2026 को जापान के नागोया में आयोजित एशियाई पैरा खेलों में कपिल परमार ने पुरुषों की जे1 श्रेणी के 70 किलोग्राम भार वर्ग में कांस्य पदक जीता। सेमीफाइनल में हारने के बाद कपिल ने कांस्य पदक मुकाबले में इंडोनेशिया के अहनाफ रफली शिदकी को महज एक मिनट नौ सेकंड में इप्पोन के जरिए हराया।

कपिल परमार ने पेरिस पैरालंपिक 2024 में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा था। वह पैरालंपिक जूडो में पदक जीतने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बने। उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें वर्ष 2024 के अर्जुन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।

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एशियाई पैरा खेलों की शुरुआत कब हुई?

एशियाई पैरा खेलों का पहला आधिकारिक आयोजन 12 से 19 दिसंबर 2010 तक चीन के ग्वांगझोऊ शहर में हुआ था। इसमें 41 देशों और क्षेत्रों के लगभग 3,798 खिलाड़ियों ने 19 खेलों में हिस्सा लिया।

इन खेलों का आयोजन एशियाई पैरालंपिक समिति करती है। इसका उद्देश्य दिव्यांग खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय मंच प्रदान करना, खेल प्रतिभाओं को बढ़ावा देना और खेलों में समान अवसर सुनिश्चित करना है।

1975 से जुड़ा है एशियाई पैरा खेलों का इतिहास

एशियाई पैरा खेलों की ऐतिहासिक नींव वर्ष 1975 में जापान के ओइता शहर में आयोजित FESPIC Games से जुड़ी है। ये प्रतियोगिताएं मुख्य रूप से पूर्वी एशिया और दक्षिण प्रशांत क्षेत्र के दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए आयोजित की जाती थीं।

समय के साथ इसमें अन्य एशियाई देशों की भागीदारी बढ़ती गई। वर्ष 2006 में एशियाई पैरालंपिक समिति के गठन के बाद खेलों को नया स्वरूप दिया गया और वर्ष 2010 में पहली बार एशियाई पैरा खेलों के नाम से आयोजन हुआ।

एशियाई पैरा खेल 2026 में भारत की शानदार शुरुआत

वर्तमान में जापान के आइची-नागोया में 18 से 24 अक्टूबर 2026 तक पांचवें एशियाई पैरा खेल आयोजित किए जा रहे हैं।

19 अक्टूबर को भारत की मोना अग्रवाल ने महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफल एसएच1 स्पर्धा में स्वर्ण और अवनि लेखरा ने रजत पदक जीतकर भारत को शानदार शुरुआत दिलाई। मोना ने 250.0 अंकों के साथ नया एशियाई पैरा खेल रिकॉर्ड भी बनाया।

शियाई पैरा खेल केवल पदकों की प्रतियोगिता नहीं, बल्कि साहस, समान अवसर और खेल प्रतिभा का अंतरराष्ट्रीय मंच हैं। पिछले 16 वर्षों में भारतीय खिलाड़ियों ने इन खेलों में अपनी मजबूत पहचान बनाई है।

भारत के लिए यादगार रहा एशियन पैरा गेम्स का पहला दिन

निशानेबाजी में मोना अग्रवाल और अवनि लेखरा की दोहरी सफलता तथा जूडो में कोकिला और कपिल परमार के पदकों ने भारत के अभियान को शानदार शुरुआत दी है। विशेष रूप से मोना अग्रवाल की उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने शारीरिक चुनौतियों और कठिन परिस्थितियों का सामना करने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक हासिल किया।

वहीं, अवनि लेखरा ने एक बार फिर साबित किया कि वह दुनिया की सबसे सफल पैरा निशानेबाजों में शामिल हैं। कोकिला और कपिल परमार के प्रदर्शन ने जूडो में भी भारत की बढ़ती ताकत का परिचय दिया। इन खिलाड़ियों की उपलब्धियां न केवल भारतीय खेल जगत के लिए गौरव का विषय हैं, बल्कि उन लाखों युवाओं के लिए भी प्रेरणा हैं जो कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने सपनों को पूरा करने का प्रयास कर रहे हैं।

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