
कैंसर की दवा ₹2,700 में रिटेलर तक, MRP ₹27,000: इलाज के नाम पर यह कीमतों का कैसा खेल?
समस्या को केवल “अस्पताल बनाम मरीज” के सरल समीकरण में देखना पर्याप्त नहीं होगा। निर्माता से लेकर स्टॉकिस्ट, वितरक, अस्पताल फार्मेसी और अंतिम मरीज तक पूरी सप्लाई चेन की पारदर्शिता जरूरी है।

नई दिल्ली। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे रोगियों के लिए दवा केवल एक उत्पाद नहीं, बल्कि जीवन बचाने की उम्मीद होती है। ऐसे में यदि किसी जीवनरक्षक दवा की खुदरा विक्रेता तक पहुंचने वाली कीमत और उस पर अंकित अधिकतम खुदरा मूल्य के बीच कई गुना अंतर हो, तो यह केवल बाजार और मुनाफे का विषय नहीं रह जाता। यह स्वास्थ्य सेवा की पारदर्शिता, रोगियों के अधिकार और सरकारी मूल्य नियंत्रण व्यवस्था से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन जाता है।
इसी मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय ने कैंसर की दवाओं की कीमतों को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान ऐसा उदाहरण रखा गया, जिसमें कैंसर की एक आवश्यक दवा की खुदरा विक्रेता के लिए कीमत लगभग 2,700 रुपये बताई गई, जबकि उसी दवा पर 27,000 रुपये का अधिकतम खुदरा मूल्य अंकित था। इस भारी अंतर पर न्यायालय ने कड़ी नाराजगी जताई और इसे मरीजों के आर्थिक शोषण से जुड़ा गंभीर मामला माना।
दवा की कीमत में दस गुना अंतर क्यों?
यही इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। कोई दवा निर्माता से निकलकर रोगी तक पहुंचने से पहले वितरक, भंडारकर्ता और खुदरा विक्रेता सहित कई स्तरों से गुजर सकती है। इन स्तरों पर परिवहन, भंडारण और वितरण लागत के साथ व्यापारिक लाभ भी जुड़ता है।
लेकिन जब अंतिम अधिकतम खुदरा मूल्य और खुदरा विक्रेता की खरीद कीमत के बीच असामान्य रूप से बड़ा अंतर दिखाई देता है, तो मूल्य निर्धारण व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यह भी समझना जरूरी है कि 2,700 रुपये और 27,000 रुपये के बीच का पूरा अंतर किसी अस्पताल का शुद्ध लाभ मान लेना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। वास्तविक लाभ निर्धारित करने के लिए पूरी आपूर्ति शृंखला, खरीद मूल्य, कर, वितरण लागत और विभिन्न स्तरों पर मिलने वाले व्यापारिक लाभ का विवरण आवश्यक है।
इसके बावजूद दस गुना तक का अंतर अपने आप में ऐसा तथ्य है जिसकी नियामकीय जांच आवश्यक दिखाई देती है।
कैंसर रोगी के सामने विकल्प बेहद सीमित
सामान्य वस्तु खरीदते समय उपभोक्ता अलग-अलग दुकानों और उत्पादों की कीमतों की तुलना कर सकता है। गंभीर बीमारी में मरीज के पास इतनी स्वतंत्रता हमेशा नहीं होती।
कैंसर के उपचार में समय अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। रोगी और उसका परिवार चिकित्सक द्वारा निर्धारित उपचार शुरू कराने के लिए मानसिक दबाव में होते हैं। यदि दवा अत्यधिक महंगी है, तब भी परिवार के सामने उपचार रोकने का विकल्प आसान नहीं होता।
सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष सुनवाई के दौरान यह पहलू भी सामने आया कि महंगे उपचार और दवाओं के कारण कुछ परिवारों को अपनी संपत्ति और आभूषण तक बेचने पड़ते हैं। इसी कारण जीवनरक्षक दवाओं की कीमत को सामान्य बाजार व्यवस्था से अलग दृष्टि से देखने की आवश्यकता महसूस होती है।
दवाओं की कीमत नियंत्रित करने की क्या व्यवस्था है?
भारत में दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण के पास है। औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश, 2013 के अंतर्गत निर्धारित दवाओं के अधिकतम मूल्य तय किए जाते हैं।
सरकार द्वारा मार्च 2026 में जारी जानकारी के अनुसार 9 मार्च तक 131 कैंसर-रोधी दवाओं के लिए अधिकतम मूल्य सीमा प्रभावी थी। सरकार का कहना था कि इससे राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची, 2015 के अंतर्गत पहले निर्धारित कीमतों की तुलना में लगभग 21 प्रतिशत कमी आई और रोगियों को अनुमानतः 294 करोड़ रुपये की वार्षिक बचत हुई।
समस्या यह है कि सभी दवाएं एक जैसी प्रत्यक्ष मूल्य नियंत्रण व्यवस्था के अंतर्गत नहीं आतीं। विशेष रूप से नई और महंगी कैंसर दवाओं की कीमतों को लेकर लगातार प्रश्न उठते रहे हैं।
अस्पतालों की आंतरिक औषधि दुकानों का मुद्दा
इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू निजी अस्पतालों की आंतरिक औषधि दुकानों से भी जुड़ा है।
सर्वोच्च न्यायालय के एक पूर्व मामले में याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि कुछ निजी अस्पताल रोगियों को अस्पताल या उससे संबद्ध औषधि दुकान से ही दवाएं और चिकित्सा सामग्री खरीदने के लिए बाध्य करते हैं। इससे रोगी को खुले बाजार में उपलब्ध कम कीमत वाले विकल्प चुनने का अवसर नहीं मिल पाता।
हालांकि, यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ये याचिकाकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोप थे। इन्हें देश के प्रत्येक निजी अस्पताल के संबंध में स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
अस्पताल क्षेत्र का तर्क भी है कि किसी दवा का अधिकतम खुदरा मूल्य अस्पताल तय नहीं करता। यह मूल्य निर्माता द्वारा निर्धारित किया जाता है और दवा मूल्य नियंत्रण का अधिकार सरकारी नियामक संस्थाओं के पास है। इसलिए पूरी समस्या को केवल अस्पतालों के लाभ से जोड़कर देखना भी अधूरा विश्लेषण होगा।
समाधान क्या हो सकता है?
इस विवाद का स्थायी समाधान केवल कीमत घटाने के आदेश से नहीं, बल्कि पूरी औषधि आपूर्ति शृंखला में पारदर्शिता बढ़ाने से निकल सकता है।
महंगी जीवनरक्षक दवाओं के मामले में निर्माता से लेकर अंतिम रोगी तक अलग-अलग स्तरों पर लगने वाली कीमत और व्यापारिक लाभ स्पष्ट होना चाहिए। जहां किसी दवा की खुदरा विक्रेता कीमत और अधिकतम खुदरा मूल्य में असामान्य अंतर पाया जाए, वहां राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण द्वारा उसकी समीक्षा की जा सकती है।
इसी तरह अस्पताल में उपचार करा रहे मरीजों को सुरक्षित और प्रमाणित बाहरी स्रोत से समान दवा खरीदने की अनुमति किन परिस्थितियों में दी जा सकती है, इसके लिए स्पष्ट राष्ट्रीय व्यवस्था की आवश्यकता पर भी विचार किया जा सकता है।
सस्ती जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता बढ़ाना, जन औषधि केंद्रों की पहुंच मजबूत करना और नई जीवनरक्षक दवाओं को मूल्य नियंत्रण व्यवस्था के अंतर्गत लाने की प्रक्रिया की समय-समय पर समीक्षा करना भी महत्वपूर्ण होगा।
सवाल मुनाफे का नहीं, उचित मुनाफे की सीमा का है
औषधि उद्योग को नई दवाओं के अनुसंधान, परीक्षण, उत्पादन, गुणवत्ता नियंत्रण और वितरण के लिए बड़े निवेश की आवश्यकता होती है। इसलिए दवा कंपनियों को उचित लाभ मिलना जरूरी है। निजी अस्पतालों और वितरकों की भी वास्तविक परिचालन लागत होती है।
लेकिन जीवनरक्षक दवाओं के मामले में उचित लाभ और असामान्य मूल्य अंतर के बीच स्पष्ट सीमा होनी चाहिए।
जब मरीज के सामने विकल्प हो—“दवा खरीदें या उपचार छोड़ें”—तब बाजार की सामान्य प्रतिस्पर्धा का सिद्धांत पूरी तरह काम नहीं करता। ऐसी स्थिति में नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
कैंसर का पता चलना किसी भी परिवार के लिए शारीरिक और भावनात्मक संकट के साथ गंभीर आर्थिक चुनौती भी बन सकता है। ऐसे समय में दवाओं की अस्पष्ट मूल्य व्यवस्था उस संकट को और बढ़ाती है।
2,700 रुपये में खुदरा विक्रेता तक पहुंचने वाली कैंसर दवा पर 27,000 रुपये का अधिकतम खुदरा मूल्य क्यों है—इस सवाल का स्पष्ट और पारदर्शी उत्तर मरीज को मिलना चाहिए।
दवा निर्माता, वितरक, अस्पताल और सरकार—सभी की भूमिका और लाभ का हिस्सा पारदर्शी होना चाहिए। रोगी को यह जानने का अधिकार है कि जिस जीवनरक्षक दवा के लिए वह अपनी वर्षों की बचत खर्च कर रहा है, उसकी वास्तविक कीमत कैसे तय हुई है।
सर्वोच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणी ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। अब आवश्यकता ऐसी व्यवस्था की है जिसमें औषधि उद्योग की आर्थिक व्यवहार्यता भी बनी रहे और बीमारी से जूझ रहे परिवार की मजबूरी अनुचित मूल्य निर्धारण का आधार भी न बने।




