
महंगाई पर अंकुश की तैयारी: RBI ने बढ़ाई रेपो दर, कर्ज पर बढ़ेगा बोझ; विकास अनुमान 7.1 प्रतिशत
इन परिस्थितियों को देखते हुए रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए खुदरा महंगाई के अनुमान को बढ़ाकर 5.2 प्रतिशत कर दिया है। ऊंची ऊर्जा कीमतें और खाद्य पदार्थों की लागत भविष्य में भी कीमतों पर दबाव बनाए रख सकती हैं।

नई दिल्ली, 7 अक्टूबर 2026।
देश में बढ़ते महंगाई दबाव के बीच भारतीय रिजर्व बैंक ने मौद्रिक नीति के मोर्चे पर बड़ा कदम उठाते हुए नीतिगत रेपो दर में 25 आधार अंकों यानी 0.25 प्रतिशत की वृद्धि कर दी है। इसके बाद रेपो दर 5.25 प्रतिशत से बढ़कर 5.50 प्रतिशत हो गई है। फरवरी 2023 के बाद यह पहली बार है जब रिजर्व बैंक ने रेपो दर में वृद्धि की है। लगभग चार वर्ष बाद ब्याज दर बढ़ाने के इस निर्णय का असर आवास, वाहन और व्यक्तिगत ऋण लेने वाले ग्राहकों से लेकर उद्योग जगत तक दिखाई दे सकता है।
रिजर्व बैंक की छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति ने यह निर्णय सर्वसम्मति से लिया। इसके साथ ही केंद्रीय बैंक ने अपनी नीतिगत दिशा को ‘तटस्थ’ से बदलकर ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ यानी परिस्थितियों के अनुसार नियंत्रित रूप से मौद्रिक सख्ती की ओर कर दिया है। यह संकेत देता है कि रिजर्व बैंक की प्राथमिकता अब बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण रखने और महंगाई को टिकाऊ रूप से काबू में लाने की है। हालांकि भविष्य में ब्याज दरों में और वृद्धि होगी या नहीं, यह आने वाले महंगाई, वृद्धि और वैश्विक परिस्थितियों के आंकड़ों पर निर्भर करेगा।
महंगाई बनी सबसे बड़ी चिंता
रेपो दर बढ़ाने के पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारण महंगाई के बढ़ते जोखिम हैं। कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, खाद्य वस्तुओं पर दबाव, कमजोर मानसून से जुड़ी चिंताएं और वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बने हुए हैं। उपभोक्ता मूल्य आधारित महंगाई अगस्त में 4.82 प्रतिशत रही और लगातार तीसरे महीने रिजर्व बैंक के 4 प्रतिशत के मध्यावधि लक्ष्य से ऊपर बनी रही। मूल महंगाई भी लगभग 4.4 प्रतिशत के स्तर तक पहुंची है।
इन परिस्थितियों को देखते हुए रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए खुदरा महंगाई के अनुमान को बढ़ाकर 5.2 प्रतिशत कर दिया है। ऊंची ऊर्जा कीमतें और खाद्य पदार्थों की लागत भविष्य में भी कीमतों पर दबाव बनाए रख सकती हैं। रुपये की कमजोरी से आयातित कच्चा तेल और अन्य वस्तुएं महंगी होने का जोखिम भी बना हुआ है।
अर्थव्यवस्था मजबूत, विकास अनुमान बढ़कर 7.1 प्रतिशत
महंगाई की चिंता के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत वृद्धि रिजर्व बैंक के लिए राहत की बात है। RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद यानी GDP की वृद्धि दर का अनुमान बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत कर दिया है। इससे पहले इसके 6.7 प्रतिशत रहने का अनुमान था। यानी केंद्रीय बैंक ने वृद्धि अनुमान में 0.4 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी की है।
मजबूत घरेलू मांग, विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों में गतिविधियों का विस्तार तथा बैंक ऋण में तेज वृद्धि अर्थव्यवस्था की मजबूती को दर्शाती है। यही कारण है कि रिजर्व बैंक को लगता है कि अर्थव्यवस्था महंगाई नियंत्रित करने के लिए की जा रही सीमित मौद्रिक सख्ती को सहने की स्थिति में है।
एक अर्थ में यह मौद्रिक नीति दो अलग-अलग तस्वीरें सामने रखती है—एक ओर महंगाई से पैदा होती चिंता है, तो दूसरी ओर तेज आर्थिक वृद्धि भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत दे रही है।
आम आदमी की जेब पर क्या असर पड़ेगा?
रेपो दर वह ब्याज दर है जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को अल्पावधि धन उपलब्ध कराता है। इसमें बढ़ोतरी होने पर बैंकों के लिए धन की लागत बढ़ सकती है। इसके बाद बैंक कुछ ऋणों की ब्याज दरें बढ़ा सकते हैं।
विशेष रूप से रेपो दर से जुड़ी परिवर्तनशील ब्याज दर वाले आवास ऋण पर असर अपेक्षाकृत जल्दी दिखाई दे सकता है। ऐसे ग्राहकों के सामने बैंक के नियम और ऋण की पुनर्निर्धारण तिथि के अनुसार दो स्थितियां बन सकती हैं—या तो मासिक किस्त बढ़ेगी अथवा ऋण चुकाने की अवधि लंबी हो सकती है। वाहन और व्यक्तिगत ऋण की नई ब्याज दरें भी प्रभावित हो सकती हैं।
हालांकि हर ग्राहक की EMI तत्काल 0.25 प्रतिशत के समान अनुपात में बढ़े, यह जरूरी नहीं है। वास्तविक असर संबंधित बैंक, ऋण की ब्याज व्यवस्था, शेष अवधि और दर पुनर्निर्धारण की शर्तों पर निर्भर करेगा।
दूसरी ओर, ब्याज दरों में वृद्धि का एक सकारात्मक पहलू बचतकर्ताओं के लिए हो सकता है। यदि बैंक जमा दरें बढ़ाते हैं तो सावधि जमा और अन्य ब्याज आधारित बचत साधनों पर बेहतर प्रतिफल मिलने की संभावना बन सकती है।
बाजार में भी बढ़ी सतर्कता
रिजर्व बैंक के फैसले के बाद सरकारी बॉन्ड की प्रतिफल दरों में तेजी दिखाई दी। 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड का प्रतिफल बढ़कर इस वर्ष के उच्च स्तर के आसपास पहुंच गया। बाजार इस फैसले को केवल एक बार की दर वृद्धि के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की मौद्रिक नीति के संकेत के तौर पर भी देख रहा है।
शेयर बाजार के लिए ब्याज दरों का बढ़ना मिश्रित संकेत है। बैंकिंग, आवास, वाहन और अन्य ऋण आधारित क्षेत्रों पर महंगी पूंजी का दबाव पड़ सकता है। वहीं मजबूत 7.1 प्रतिशत वृद्धि अनुमान निवेशकों के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का सकारात्मक संकेत भी देता है।
महंगाई और विकास के बीच संतुलन की चुनौती
रिजर्व बैंक के सामने सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक वृद्धि को नुकसान पहुंचाए बिना महंगाई पर नियंत्रण रखने की है। यदि ब्याज दरें बहुत तेजी से बढ़ाई जाती हैं तो कर्ज महंगा होने से उपभोग और निवेश प्रभावित हो सकता है। दूसरी ओर, यदि बढ़ती महंगाई को लंबे समय तक अनदेखा किया जाता है तो आम परिवारों की क्रय शक्ति घट सकती है और अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालिक दबाव पैदा हो सकता है।
इसी कारण ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ का रुख महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ अचानक अत्यधिक सख्ती के बजाय आर्थिक आंकड़ों के आधार पर चरणबद्ध और संतुलित निर्णय लेना है।
कुल मिलाकर, 7 अक्टूबर 2026 की मौद्रिक नीति ने स्पष्ट कर दिया है कि रिजर्व बैंक फिलहाल महंगाई के जोखिम को गंभीरता से ले रहा है। 25 आधार अंकों की रेपो दर वृद्धि से कर्ज लेने वालों पर कुछ अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है, लेकिन साथ ही 7.1 प्रतिशत का बढ़ा हुआ विकास अनुमान यह संदेश देता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद अभी मजबूत बनी हुई है। आने वाले महीनों में अब सबसे अधिक नजर कच्चे तेल की कीमतों, खाद्य महंगाई, मानसून के प्रभाव और वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों पर रहेगी।




