
CEC ज्ञानेश कुमार पर बढ़ा राजनीतिक दबाव: SIR और आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों के बाद हटाने का प्रस्ताव लाने की तैयारी
मुख्य चुनाव आयुक्त को केंद्र सरकार सामान्य प्रशासनिक आदेश से पद से नहीं हटा सकती। संविधान के अनुच्छेद 324(5) में स्पष्ट है कि CEC को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिन पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है।

नई दिल्ली, 25 सितंबर 2026। देश की चुनावी व्यवस्था की निष्पक्षता और निर्वाचन आयोग की आंतरिक निर्णय-प्रक्रिया को लेकर एक बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक विवाद खड़ा हो गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी गठबंधन संसद के दोनों सदनों में उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी कर रहा है। 24 सितंबर तक सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, विपक्ष कानूनी विशेषज्ञों के साथ प्रस्ताव का मसौदा तैयार कर रहा है और नोटिस जल्द दिया जा सकता है।
विवाद की जड़ में निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूचियों का स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और आयोग के भीतर पिछले लगभग दस महीनों में दर्ज की गई आपत्तियां हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की खोजी रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने या बहाल करने, Form 6 में बदलाव और मतदाता डेटाबेस के संचालन जैसे विषयों पर कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्तियां दर्ज कीं।
13 करोड़ से अधिक नाम और SIR पर सवाल
रिपोर्ट के अनुसार, जून 2025 में बिहार से शुरू हुई SIR प्रक्रिया आगे चलकर 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक पहुंची और मसौदा मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए। इतनी बड़ी संख्या के कारण मतदाता सूची की शुद्धता के साथ-साथ यह प्रश्न भी राजनीतिक बहस के केंद्र में आया कि किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से सूची से बाहर न रह जाए।
विपक्षी दल SIR को लेकर लगातार गंभीर आरोप लगा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों को स्थापित तथ्य मानना उचित नहीं होगा, क्योंकि निर्वाचन आयोग ने विवाद के बीच स्पष्ट किया है कि उसके फैसले सामूहिक रूप से लिए गए और SIR सहित उसके निर्णय सर्वसम्मत थे। आयोग का कहना है कि आंतरिक टिप्पणियां और विचार-विमर्श संस्थागत निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं।
यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण तथ्यात्मक अंतर है—एक तरफ दो चुनाव आयुक्तों द्वारा अलग-अलग मुद्दों पर दर्ज आपत्तियों की रिपोर्ट है, दूसरी तरफ निर्वाचन आयोग का आधिकारिक पक्ष है कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए। आयोग ने 14 आंतरिक नोटों के अस्तित्व, तारीखों या उनकी सामग्री को विवादित नहीं किया, लेकिन कहा कि केवल इन नोटों को देखने से निर्णय-प्रक्रिया की अधूरी तस्वीर सामने आती है।
Form 6 और डेटाबेस को लेकर क्या आपत्तियां थीं?
सबसे गंभीर प्रक्रियागत विवादों में से एक नए मतदाताओं के पंजीकरण में इस्तेमाल होने वाले Form 6 से जुड़ा है। रिपोर्टों के मुताबिक, मई 2026 में विवेक जोशी ने दर्ज किया कि वैधानिक Form 6 में नियमों में संशोधन किए बिना बदलाव नहीं किया जाना चाहिए। बाद में सुखबीर सिंह संधू ने भी इस विषय पर आपत्ति दर्ज की।
दूसरा बड़ा मुद्दा मतदाता सूची के डिजिटल ढांचे और उसके नियंत्रण का था। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने मतदाता डेटाबेस के बढ़ते केंद्रीकरण और राज्यों के अधिकारियों की तकनीकी पहुंच से जुड़े विषयों पर सवाल उठाए। दोनों आयुक्तों द्वारा आईटी ढांचे से संबंधित कार्य आवंटन के विषय में कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखे जाने की भी खबर सामने आई।
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से जुड़े मामलों ने विवाद को और बढ़ाया। रिपोर्ट के मुताबिक, वहां मतदाताओं को शामिल किए जाने के फैसलों के खिलाफ बड़ी संख्या में अपीलों के संदर्भ में संधू ने पूछा कि निर्वाचन आयोग की ओर से ऐसी अपीलें दाखिल करने की अनुमति किसने दी थी।
क्या CEC अकेले निर्णय ले सकते हैं?
इस विवाद का महत्वपूर्ण पहलू निर्वाचन आयोग की संवैधानिक संरचना है। संविधान का अनुच्छेद 324 चुनावों और मतदाता सूचियों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग को देता है। संविधान यह भी कहता है कि अन्य चुनाव आयुक्त नियुक्त होने पर मुख्य चुनाव आयुक्त आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य करते हैं।
वहीं मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 के अनुसार आयोग का काम यथासंभव सर्वसम्मति से किया जाना चाहिए। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच किसी विषय पर मतभेद होने की स्थिति में फैसला बहुमत की राय से होता है।
इसी कानूनी व्यवस्था के कारण वर्तमान विवाद केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि जिन विषयों पर आंतरिक आपत्तियां दर्ज हुईं, उन पर अंतिम संस्थागत निर्णय किस प्रक्रिया से लिए गए। निर्वाचन आयोग का पक्ष है कि उसके अंतिम निर्णय सर्वसम्मत थे।
विपक्ष ने बढ़ाया दबाव, BJP ने आरोपों को किया खारिज
आंतरिक आपत्तियों से जुड़ी रिपोर्ट सामने आने के बाद कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने CEC पर राजनीतिक हमला तेज कर दिया है। कुछ विपक्षी नेताओं ने उनके इस्तीफे या पद से हटाए जाने की मांग की है, जबकि SIR की प्रक्रिया की न्यायिक जांच या उसे रोकने की मांग भी उठाई गई है।
दूसरी ओर BJP ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है। पार्टी का तर्क है कि चुनाव आयुक्तों के बीच किसी विषय पर विचारों का आदान-प्रदान या मतभेद होना संस्था के भीतर लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा है और इससे अपने-आप यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि आयोग की अंतिम निर्णय-प्रक्रिया गैरकानूनी थी।
CEC को हटाना आसान नहीं, संविधान ने रखी है कड़ी प्रक्रिया
मुख्य चुनाव आयुक्त को केंद्र सरकार सामान्य प्रशासनिक आदेश से पद से नहीं हटा सकती। संविधान के अनुच्छेद 324(5) में स्पष्ट है कि CEC को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिन पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है।
न्यायाधीशों की हटाने की प्रक्रिया में लोकसभा में नोटिस के लिए कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं। नोटिस स्वीकार होने पर तीन सदस्यीय जांच समिति गठित होती है। आरोप सिद्ध होने की स्थिति में संसदीय प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
अंतिम चरण में प्रत्येक सदन में प्रस्ताव को सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पारित होना होता है। इसके बाद राष्ट्रपति द्वारा हटाने का आदेश जारी किया जाता है। इसलिए विपक्ष द्वारा प्रस्ताव लाने की तैयारी और वास्तव में CEC को पद से हटाया जाना दो अलग-अलग संवैधानिक चरण हैं।
आगे क्या?
24 सितंबर तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार विपक्ष ने अभी प्रक्रिया पूरी नहीं की है; वह प्रस्ताव का मसौदा तैयार कर रहा है और दोनों सदनों में नोटिस देने की तैयारी में है। इसलिए इसे इस समय CEC को हटाने की विपक्ष की प्रस्तावित संसदीय पहल के रूप में देखना अधिक सटीक है, न कि पूरी हो चुकी महाभियोग प्रक्रिया के रूप में।
अब निगाहें तीन मोर्चों पर रहेंगी—विपक्ष प्रस्ताव के लिए आवश्यक सांसदों का समर्थन जुटा पाता है या नहीं; संसद में नोटिस दिए जाने पर संवैधानिक प्रक्रिया किस दिशा में जाती है; और निर्वाचन आयोग अपने आंतरिक नोट्स तथा अंतिम फैसलों के बीच दिखाई दे रहे अंतर पर आगे क्या स्पष्टीकरण देता है।
यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मामला किसी एक अधिकारी या राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में भारत की मतदाता सूची, निर्वाचन आयोग की सामूहिक निर्णय प्रणाली और चुनावी संस्थाओं में सार्वजनिक विश्वास जैसे प्रश्न हैं। साथ ही, आयोग का यह पक्ष भी रिकॉर्ड पर है कि उसके अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। ऐसे में आगे की संसदीय, न्यायिक और संस्थागत कार्यवाही ही यह स्पष्ट करेगी कि दर्ज आपत्तियों का कानूनी महत्व क्या है और क्या उनसे किसी औपचारिक जवाबदेही का आधार बनता है।




