
DPDP कानून और पत्रकारिता की स्वतंत्रता: क्या खोजी पत्रकारिता पर मंडरा रहा है संकट?
क्या भारत में अब भ्रष्टाचार का खुलासा करने से पहले पत्रकारों को संबंधित व्यक्ति की अनुमति लेनी पड़ेगी? क्या कोई प्रभावशाली व्यक्ति अपनी असुविधा का कारण बनने वाली पुरानी खबर को हटाने की मांग कर सकेगा?

LIVE 24 TV | विशेष रिपोर्ट | 30 अक्टूबर 2026
देश में डिजिटल डेटा की सुरक्षा के लिए बनाया गया डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) कानून, 2023 अब पत्रकारिता की स्वतंत्रता को लेकर एक बड़ी कानूनी और लोकतांत्रिक बहस का केंद्र बन गया है। जिस कानून का मुख्य उद्देश्य नागरिकों की निजी जानकारी को सुरक्षित रखना और डिजिटल डेटा के दुरुपयोग को रोकना है, उसी कानून के कुछ प्रावधानों पर देश के प्रमुख समाचार संस्थानों ने गंभीर सवाल उठाए हैं।
विवाद का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अगर किसी पत्रकार को भ्रष्टाचार, सरकारी अनियमितता, आर्थिक घोटाले या सत्ता के दुरुपयोग की जांच के लिए किसी व्यक्ति की निजी जानकारी का इस्तेमाल करना पड़े, तो क्या उसे पहले उसी व्यक्ति की सहमति लेनी होगी जिसकी जांच की जा रही है?
समाचार संस्थानों का तर्क है कि ऐसी व्यवस्था खोजी पत्रकारिता को प्रभावित कर सकती है। यदि किसी अधिकारी, नेता या कारोबारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने से पहले उसकी अनुमति लेना आवश्यक हो, तो संबंधित व्यक्ति को जांच की जानकारी समय से पहले मिल सकती है। इससे दस्तावेज नष्ट होने, गवाहों पर दबाव पड़ने या पत्रकारिता की स्वतंत्र जांच प्रभावित होने की आशंका पैदा हो सकती है।
इस विवाद ने अब सुप्रीम कोर्ट का ध्यान भी खींचा है। 27 अक्टूबर 2026 को देश के 21 समाचार प्रकाशकों का प्रतिनिधित्व करने वाले डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने स्पष्ट किया कि नागरिकों की निजता और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है।
मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को निर्धारित है। अदालत ने फिलहाल विवादित प्रावधानों पर रोक नहीं लगाई है और न ही कानून की संवैधानिक वैधता पर अंतिम निर्णय दिया है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ? 17 नवंबर को अगली सुनवाई
27 अक्टूबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने DNPA की याचिका पर सुनवाई की।
संगठन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने दलील दी कि अगर पत्रकारों को खबर के विषय से जुड़े व्यक्ति की सहमति पर निर्भर होना पड़े, तो स्वतंत्र रिपोर्टिंग प्रभावित हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा, लेकिन सरकार का पक्ष सुने बिना विवादित प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। न्यायालय ने इस बात पर भी जोर दिया कि नागरिकों की निजता और मीडिया की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है।
मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को निर्धारित है। अभी सुप्रीम कोर्ट ने कानून की संवैधानिक वैधता पर कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है।
क्या है DPDP कानून और इसे बनाने की जरूरत क्यों पड़ी?
डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 भारत का एक प्रमुख डेटा संरक्षण कानून है। इसे संसद ने अगस्त 2023 में पारित किया था और 11 अगस्त 2023 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली थी। इस कानून का उद्देश्य डिजिटल माध्यमों पर एकत्र और इस्तेमाल की जाने वाली नागरिकों की व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। आज मोबाइल फोन, बैंकिंग ऐप, सोशल मीडिया, ऑनलाइन खरीदारी, अस्पताल, स्कूल, निजी कंपनियां और सरकारी डिजिटल सेवाएं बड़ी मात्रा में नागरिकों की व्यक्तिगत जानकारी एकत्र करती हैं।
इस जानकारी में व्यक्ति का नाम, मोबाइल नंबर, ईमेल, पता, पहचान से संबंधित विवरण, वित्तीय जानकारी और अन्य ऐसे डेटा शामिल हो सकते हैं जिनसे किसी व्यक्ति की पहचान की जा सके। कानून की मूल अवधारणा यह है कि किसी व्यक्ति की निजी जानकारी का इस्तेमाल वैध उद्देश्य से, निर्धारित नियमों के अनुसार और उचित सुरक्षा उपायों के साथ किया जाना चाहिए। DPDP कानून मुख्य रूप से डिजिटल रूप में एकत्र किए गए व्यक्तिगत डेटा और बाद में डिजिटल बनाए गए व्यक्तिगत डेटा पर लागू होने के लिए बनाया गया है। इसमें डेटा एकत्र करने वाली या उसके इस्तेमाल का उद्देश्य और तरीका तय करने वाली संस्था को डेटा फिड्यूशियरी तथा संबंधित व्यक्ति को डेटा प्रिंसिपल कहा गया है।
कानून के अंतर्गत निर्धारित परिस्थितियों को छोड़कर व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण के लिए वैध सहमति या कानून में मान्य अन्य आधार आवश्यक होंगे। व्यक्ति को अपने डेटा के उपयोग की जानकारी प्राप्त करने, उसमें सुधार कराने, कुछ परिस्थितियों में उसे मिटाने का अनुरोध करने और शिकायत दर्ज कराने जैसे अधिकार दिए गए हैं। सरकार का कहना है कि यह कानून बड़ी तकनीकी कंपनियों सहित व्यक्तिगत डेटा संभालने वाली संस्थाओं को जवाबदेह बनाएगा और नागरिकों को अपनी डिजिटल जानकारी पर अधिक नियंत्रण देगा।
DPDP कानून कब से लागू है?
भारत में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP), 2023 को लेकर पत्रकारों, मीडिया संस्थानों और आम नागरिकों के बीच कई सवाल उठ रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह कानून कब से लागू हुआ और क्या इसके सभी नियम प्रभावी हो चुके हैं? दरअसल, केंद्र सरकार ने इस कानून को एक साथ लागू करने के बजाय तीन चरणों में प्रभावी करने का फैसला किया है।
संसद ने अगस्त 2023 में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम पारित किया था। इसके बाद केंद्र सरकार ने 13 नवंबर 2025 को अधिसूचना जारी कर कानून को चरणबद्ध तरीके से लागू करने की घोषणा की। इसी दौरान DPDP नियम, 2025 भी अधिसूचित किए गए। पहले चरण में डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड के गठन, सदस्यों की नियुक्ति और प्रशासनिक व्यवस्थाओं से संबंधित प्रावधान प्रभावी हुए।
इस चरण का सबसे महत्वपूर्ण बदलाव सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI), 2005 से जुड़ा है। DPDP अधिनियम की धारा 44(3) के माध्यम से RTI कानून की धारा 8(1)(j) में संशोधन किया गया। इस बदलाव के बाद व्यक्तिगत जानकारी के खुलासे को लेकर नई कानूनी बहस शुरू हो गई है। पत्रकार संगठनों का मानना है कि इससे सार्वजनिक अधिकारियों और सरकारी संस्थाओं से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त करना कठिन हो सकता है। हालांकि सार्वजनिक हित में सूचना देने से संबंधित RTI की धारा 8(2) अब भी मौजूद है।
कानून का दूसरा चरण 13 नवंबर 2026 से लागू होना निर्धारित है। इसमें सहमति प्रबंधकों के पंजीकरण और उनसे संबंधित व्यवस्थाओं के कुछ प्रावधान प्रभावी होंगे। इसका उद्देश्य नागरिकों को अपने व्यक्तिगत डेटा के उपयोग के लिए दी गई सहमति को व्यवस्थित रूप से प्रबंधित करने की सुविधा उपलब्ध कराना है। इस चरण में व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण, सहमति, डेटा सुरक्षा, डेटा फिड्यूशियरी के दायित्वों और नागरिकों के अधिकारों से जुड़े प्रमुख प्रावधान लागू होंगे। नागरिक निर्धारित परिस्थितियों में अपने डेटा की जानकारी मांगने, उसमें सुधार करवाने और उसे मिटाने का अधिकार इस्तेमाल कर सकेंगे।
पत्रकारिता के क्षेत्र में सबसे बड़ी चिंता यह है कि भविष्य में सहमति और डेटा मिटाने संबंधी प्रावधानों की व्याख्या खोजी रिपोर्टिंग को प्रभावित कर सकती है। भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितताओं और सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों से जुड़ी खबरों में व्यक्तिगत जानकारी का इस्तेमाल किस सीमा तक किया जा सकेगा, यह महत्वपूर्ण कानूनी सवाल होगा। फिलहाल 30 अक्टूबर 2026 तक कानून के मुख्य डेटा प्रसंस्करण और सहमति संबंधी प्रावधान प्रभावी नहीं हुए हैं। लेकिन RTI कानून में संशोधन लागू हो चुका है। ऐसे में नागरिकों की निजता, सूचना के अधिकार और स्वतंत्र पत्रकारिता के बीच संतुलन बनाना आने वाले समय की बड़ी चुनौती होगी।
पत्रकारिता और DPDP कानून के बीच विवाद क्या है?
भारत में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP), 2023 को लेकर पत्रकारिता की स्वतंत्रता और नागरिकों की निजता के अधिकार के बीच नई बहस शुरू हो गई है। इस विवाद की सबसे बड़ी वजह कानून में खोजी पत्रकारिता के लिए स्पष्ट और व्यापक छूट का अभाव है। पत्रकार संगठनों को आशंका है कि भविष्य में इस कानून के कुछ प्रावधान स्वतंत्र रिपोर्टिंग और सार्वजनिक हित से जुड़ी जांच को प्रभावित कर सकते हैं।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में पत्रकारिता का काम केवल सरकारी प्रेस विज्ञप्तियां प्रकाशित करना नहीं है। पत्रकारों की जिम्मेदारी सरकारी नीतियों, प्रशासनिक फैसलों, सार्वजनिक धन के इस्तेमाल, राजनीतिक गतिविधियों और शक्तिशाली संस्थाओं के कामकाज की स्वतंत्र जांच करना भी है। इसके लिए कई बार ऐसे दस्तावेजों की जरूरत पड़ती है जिनमें व्यक्तियों की पहचान और निजी जानकारी दर्ज होती है।
उदाहरण के लिए, किसी सरकारी परियोजना में भ्रष्टाचार की जांच करते समय ठेकेदारों के नाम, कंपनी निदेशकों का विवरण, भुगतान रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों के दस्तावेज महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इसी प्रकार सरकारी भर्ती घोटाले की जांच में उम्मीदवारों की चयन सूची, नियुक्ति रिकॉर्ड, परीक्षा परिणाम और अधिकारियों के फैसलों से जुड़ी जानकारी की आवश्यकता हो सकती है।
इन दस्तावेजों में मौजूद कुछ विवरण व्यक्तिगत डेटा की श्रेणी में आ सकते हैं। यहीं से पत्रकारिता और DPDP कानून के बीच विवाद शुरू होता है। समाचार संस्थानों की चिंता है कि यदि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट कानूनी अपवाद नहीं होगा, तो उन्हें भी व्यक्तिगत डेटा का इस्तेमाल करते समय डेटा फिड्यूशियरी के रूप में सामान्य कानूनी दायित्वों का पालन करना पड़ सकता है। इससे खोजी रिपोर्टिंग की प्रक्रिया जटिल हो सकती है।
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया सहित पत्रकार संगठनों ने आशंका जताई है कि किसी भ्रष्टाचार या अनियमितता में शामिल व्यक्ति की सहमति पर निर्भरता स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। यदि संबंधित व्यक्ति जानकारी के इस्तेमाल की अनुमति देने से इनकार करता है, तो महत्वपूर्ण खुलासों में कानूनी बाधाएं पैदा हो सकती हैं। हालांकि DPDP कानून यह स्पष्ट आदेश नहीं देता कि हर खबर प्रकाशित करने से पहले संबंधित व्यक्ति की अनुमति लेना अनिवार्य है। अधिनियम की धारा 3 के तहत कुछ प्रकार की सार्वजनिक रूप से उपलब्ध व्यक्तिगत जानकारी कानून के दायरे से बाहर है। धारा 7 और धारा 17 में भी कुछ वैधानिक व्यवस्थाएं तथा अपवाद मौजूद हैं।
लेकिन विवाद यह है कि क्या ये प्रावधान खोजी पत्रकारिता की सभी आवश्यकताओं की पर्याप्त सुरक्षा कर सकेंगे। 30 अक्टूबर 2026 तक कानून के मुख्य सहमति और डेटा प्रसंस्करण संबंधी प्रावधान प्रभावी नहीं हुए हैं। इनके 13 मई 2027 से लागू होने की व्यवस्था है। ऐसे में असली चुनौती नागरिकों की निजता की रक्षा करते हुए सार्वजनिक हित की पत्रकारिता, भ्रष्टाचार के खुलासों और लोकतांत्रिक जवाबदेही को सुरक्षित रखने की है।
पत्रकारिता के सामने कौन-सी 10 बड़ी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं?
1. भ्रष्टाचार का खुलासा करने से पहले अनुमति का सवाल
खोजी पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण कार्य सत्ता, प्रशासन और निजी संस्थानों में होने वाली अनियमितताओं को उजागर करना है। मान लीजिए किसी पत्रकार को सरकारी ठेके में भ्रष्टाचार से जुड़े दस्तावेज मिलते हैं। दस्तावेजों में अधिकारियों, कंपनियों और लेनदेन से संबंधित व्यक्तिगत जानकारी मौजूद है। यदि उस जानकारी के उपयोग के लिए कानून के अंतर्गत सहमति आवश्यक हुई और कोई उपयुक्त अपवाद उपलब्ध नहीं हुआ, तो पत्रकार के सामने गंभीर समस्या पैदा हो सकती है।
जिस व्यक्ति के खिलाफ जांच चल रही है, उसकी अनुमति लेकर जांच करना कई परिस्थितियों में अव्यावहारिक होगा। DNPA का तर्क है कि कानून की धारा 7 और धारा 17 में पत्रकारिता के लिए अलग और स्पष्ट छूट नहीं दी गई है। हालांकि, धारा 3 में व्यक्ति द्वारा स्वयं सार्वजनिक की गई या कानूनी बाध्यता के तहत सार्वजनिक की गई जानकारी के लिए कुछ अपवाद मौजूद हैं। इसलिए यह कहना गलत होगा कि हर सार्वजनिक सूचना के उपयोग के लिए अनुमति अनिवार्य है।
2. जांच की जानकारी पहले ही लीक होने का खतरा
कई बड़े भ्रष्टाचार के मामले गोपनीय दस्तावेजों और अंदरूनी सूत्रों की मदद से सामने आते हैं। यदि किसी रिपोर्ट की तैयारी के दौरान संबंधित व्यक्ति को डेटा उपयोग की सूचना देनी पड़े, तो उसे जांच की जानकारी समय से पहले मिल सकती है। मीडिया संगठनों की आशंका है कि इससे दस्तावेजों को नष्ट करने, डिजिटल रिकॉर्ड बदलने या गवाहों पर दबाव डालने का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि, प्रत्येक पत्रकारिता गतिविधि पर अग्रिम सूचना देने का एक समान नियम लागू होगा, यह अभी स्थापित कानूनी निष्कर्ष नहीं है।
3. प्रकाशित खबर हटाने का दबाव
कानून की धारा 12 में व्यक्तिगत डेटा को ठीक कराने और निर्धारित परिस्थितियों में मिटाने का अधिकार दिया गया है। मीडिया संगठनों की चिंता है कि यदि इसका व्यापक अर्थ निकाला गया तो सार्वजनिक हित में प्रकाशित पुरानी खबरों को हटाने की मांग बढ़ सकती है। उदाहरण के लिए, किसी सार्वजनिक पदाधिकारी के खिलाफ प्रमाणित अनियमितताओं की पुरानी रिपोर्ट उसके भविष्य के सार्वजनिक आचरण का महत्वपूर्ण रिकॉर्ड हो सकती है।
यदि ऐसी खबरें बिना पर्याप्त कानूनी परीक्षण के हटाई जाने लगें, तो समाज के सामने उपलब्ध ऐतिहासिक जानकारी प्रभावित हो सकती है। लेकिन महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि डेटा मिटाने का अधिकार हर परिस्थिति में पूरी खबर हटवाने का स्वतः अधिकार नहीं देता। कानून में सहमति, डेटा रखने की आवश्यकता और अन्य वैधानिक दायित्व भी महत्वपूर्ण हैं।
4. सूत्रों की पहचान उजागर होने की आशंका
यह इस विवाद के सबसे गंभीर पहलुओं में से एक है। कानून की धारा 36 सरकार को निर्धारित उद्देश्यों के लिए डेटा फिड्यूशियरी और मध्यस्थ संस्थाओं से जानकारी मांगने की शक्ति देती है। इसके अंतर्गत बनाए गए नियम 23 में कुछ परिस्थितियों में ऐसी सूचना मांगने की प्रक्रिया का प्रावधान है। राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की संप्रभुता से जुड़ी निर्धारित परिस्थितियों में सूचना दिए जाने की जानकारी गोपनीय रखने की व्यवस्था भी है।
मीडिया संगठनों को आशंका है कि ऐसी शक्तियों का प्रयोग गोपनीय पत्रकारिता सूत्रों से संबंधित डेटा तक पहुंचने के लिए हो सकता है। हालांकि, यह प्रावधान सीधे हर पत्रकार के स्रोत को सार्वजनिक करने का असीमित अधिकार नहीं देता। इसकी कानूनी सीमाओं और संवैधानिक सुरक्षा का परीक्षण महत्वपूर्ण होगा।
5. ₹250 करोड़ तक का जुर्माना, छोटे न्यूज संस्थानों की चिंता
DPDP कानून में कुछ गंभीर उल्लंघनों के लिए भारी आर्थिक दंड की व्यवस्था है। उदाहरण के लिए, व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के लिए उचित उपाय नहीं अपनाने से संबंधित उल्लंघन पर अधिकतम ₹250 करोड़ तक का आर्थिक दंड लगाया जा सकता है। डेटा उल्लंघन की सूचना देने में संबंधित चूक के लिए अधिकतम ₹200 करोड़ तक के दंड का प्रावधान भी है।
हालांकि, ये अधिकतम सीमाएं हैं। प्रत्येक उल्लंघन पर इतना जुर्माना लगना अनिवार्य नहीं है। बड़े मीडिया संस्थानों के पास कानूनी और तकनीकी संसाधन होते हैं, लेकिन छोटे डिजिटल न्यूज चैनल और स्वतंत्र पत्रकार सीमित साधनों से काम करते हैं। ऐसी स्थिति में नियमों की अस्पष्टता और संभावित कानूनी खर्च पत्रकारिता पर आर्थिक दबाव बढ़ा सकते हैं।
6. बार-बार उल्लंघन पर वेबसाइट ब्लॉक होने की आशंका
कानून की धारा 37 के अंतर्गत कुछ निर्धारित परिस्थितियों में सार्वजनिक पहुंच रोकने का प्रावधान मौजूद है। इसके लिए डेटा संरक्षण बोर्ड की ओर से दो या अधिक अवसरों पर आर्थिक दंड लगाए जाने और सार्वजनिक हित में पहुंच रोकने की सिफारिश जैसी शर्तें निर्धारित हैं। सरकार को संबंधित संस्था को सुनवाई का अवसर देना होगा और निर्णय के कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे। मीडिया संगठनों का सवाल है कि यदि इस शक्ति का उपयोग किसी समाचार प्रकाशक पर किया जाता है, तो उसके डिजिटल संचालन पर कितना व्यापक असर पड़ सकता है।
DPDP कानून की धारा 37 में कुछ निर्धारित परिस्थितियों में किसी डेटा फिड्यूशियरी से संबंधित कंप्यूटर संसाधन तक पहुंच अवरुद्ध करने की प्रक्रिया का प्रावधान है।लेकिन यह शक्ति सामान्य रूप से हर विवादित खबर हटाने का अधिकार नहीं है। कानून में इसके लिए चरणबद्ध शर्तें निर्धारित हैं। संबंधित संस्था के खिलाफ कम से कम दो अवसरों पर आर्थिक दंड लगाया गया हो, डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड की सिफारिश हो और आवश्यक प्रक्रिया पूरी की गई हो।
प्रभावित पक्ष को सुनवाई का अवसर देना भी महत्वपूर्ण कानूनी शर्त है। मीडिया प्रकाशकों का तर्क है कि इसके बावजूद समाचार संस्थानों के डिजिटल संचालन पर व्यापक प्रतिबंध की संभावना चिंता पैदा करती है। विशेष रूप से पत्रकार संगठनों ने सार्वजनिक हित के आधार पर वेबसाइट तक पहुंच रोकने की शक्ति की संवैधानिक सीमाओं पर सवाल उठाया है। इस प्रावधान की वैधता और पत्रकारिता पर इसके संभावित इस्तेमाल के मुद्दे भी सुप्रीम कोर्ट में उठाए गए हैं।
7. सूचना के अधिकार पर प्रभाव
DPDP कानून के माध्यम से सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(j) में संशोधन किया गया है। पहले इस प्रावधान में व्यक्तिगत जानकारी के प्रकटीकरण से संबंधित सार्वजनिक गतिविधि, निजता और व्यापक जनहित जैसी शर्तें शामिल थीं। संशोधन के बाद संबंधित खंड की भाषा केवल व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित सूचना को छूट के दायरे में रखती है। मीडिया संगठनों और RTI कार्यकर्ताओं की चिंता है कि इससे सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही से जुड़ी कुछ सूचनाएं प्राप्त करना कठिन हो सकता है।
दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि नागरिकों की निजता और पारदर्शिता के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए यह बदलाव किया गया है। यह भी महत्वपूर्ण है कि RTI अधिनियम की धारा 8(2) में सार्वजनिक हित से संबंधित व्यवस्था बनी हुई है। इसलिए व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित हर आवेदन स्वतः अस्वीकार हो जाएगा, ऐसा कहना उचित नहीं है।
8. लाइव रिपोर्टिंग और घटनास्थल पर कवरेज
दुर्घटना, विरोध प्रदर्शन, चुनावी सभा, प्राकृतिक आपदा और सार्वजनिक कार्यक्रमों की रिपोर्टिंग में बड़ी संख्या में लोगों की तस्वीरें या वीडियो रिकॉर्ड किए जाते हैं। ऐसे मामलों में पत्रकारों को कई बार तुरंत रिपोर्टिंग करनी पड़ती है। यदि व्यक्तिगत डेटा के उपयोग पर लागू कानूनी दायित्वों की सीमाएं स्पष्ट नहीं हुईं, तो कैमरे में दिखाई देने वाले व्यक्तियों की पहचान और जानकारी के उपयोग को लेकर अनिश्चितता पैदा हो सकती है।
9. साक्षात्कार में सहमति वापस लेने का विवाद
मान लीजिए किसी व्यक्ति ने पत्रकार को साक्षात्कार दिया और बाद में अपने बयान को लेकर विवाद पैदा होने पर सहमति वापस लेने की बात कही। कानून में सहमति वापस लेने का अधिकार मौजूद है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि किसी स्थिति में पहले प्रकाशित पूरी खबर को तुरंत हटाना ही पड़ेगा। कानून की धारा 6(5) के अनुसार सहमति वापस लेना उसके पहले सहमति के आधार पर हुए वैध डेटा प्रसंस्करण को पूर्वव्यापी रूप से अवैध नहीं बनाता। मीडिया संस्थान चाहते हैं कि तथ्यात्मक और जनहितकारी साक्षात्कारों के अभिलेखों को लेकर भी स्पष्ट कानूनी संरक्षण हो।
10. पत्रकारिता में कानूनी अनिश्चितता बढ़ने का खतरा
किसी कानून का प्रभाव केवल उसके तहत की गई कार्रवाई से ही नहीं, बल्कि संभावित कार्रवाई के डर से भी हो सकता है। यदि पत्रकारों को यह स्पष्ट नहीं होगा कि कौन-सी जानकारी का उपयोग वैध है और किस परिस्थिति में आर्थिक दंड लग सकता है, तो कुछ संस्थान संवेदनशील विषयों पर रिपोर्टिंग से बच सकते हैं। इससे विशेष रूप से स्वतंत्र पत्रकारिता और स्थानीय समाचार संस्थानों पर असर पड़ने की आशंका है। यही कारण है कि मीडिया संगठन सामान्य समाचार संकलन, जनहितकारी जांच, डिजिटल अभिलेख और गोपनीय सूत्रों के लिए स्पष्ट नियम चाहते हैं।
RTI कानून में बदलाव ने क्यों बढ़ाई पत्रकारों की चिंता?
DPDP कानून से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण और पहले से प्रभावी बदलाव सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 में किया गया संशोधन है। DPDP अधिनियम की धारा 44(3) ने RTI कानून की धारा 8(1)(j) में परिवर्तन किया है। पहले इस प्रावधान में व्यक्तिगत सूचना देने से इनकार करने के लिए उसकी सार्वजनिक गतिविधि से प्रासंगिकता, निजता के अनुचित उल्लंघन और व्यापक सार्वजनिक हित जैसे पहलुओं पर विचार करने की व्यवस्था थी।
नए प्रावधान में व्यक्तिगत सूचना से संबंधित जानकारी को प्रकटीकरण से छूट की श्रेणी में रखने के लिए व्यापक शब्दावली अपनाई गई है। पत्रकारों और सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं का तर्क है कि इस बदलाव से सरकारी कार्यालय व्यक्तिगत सूचना का आधार बताकर पहले की तुलना में अधिक दस्तावेज रोकने की कोशिश कर सकते हैं।मान लीजिए कोई पत्रकार किसी सरकारी अधिकारी की नियुक्ति, हितों के टकराव, सरकारी आवास के आवंटन या सार्वजनिक धन के इस्तेमाल में अनियमितता की जांच कर रहा है। इस जांच में कुछ ऐसे दस्तावेज आवश्यक हो सकते हैं जिनमें संबंधित अधिकारी या अन्य व्यक्तियों की निजी जानकारी शामिल हो।
पत्रकार संगठनों का कहना है कि यदि ऐसे दस्तावेजों को बिना पर्याप्त सार्वजनिक हित परीक्षण के रोक दिया जाए, तो सरकारी जवाबदेही की जांच कमजोर हो सकती है।दूसरी ओर केंद्र सरकार का कहना है कि संशोधन के बावजूद RTI कानून की धारा 8(2) प्रभावी है। यह प्रावधान सार्वजनिक प्राधिकरण को ऐसी सूचना देने की अनुमति देता है, जिसके प्रकटीकरण में सार्वजनिक हित उससे होने वाले नुकसान से अधिक हो। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि DPDP संशोधन के बाद RTI के माध्यम से किसी भी व्यक्तिगत सूचना का खुलासा कानूनी रूप से असंभव हो गया है। असली विवाद यह है कि संशोधित धारा 8(1)(j) और पहले से मौजूद धारा 8(2) की व्याख्या सरकारी अधिकारी, सूचना आयोग और अदालतें किस तरह करेंगी।
21 बड़े समाचार संस्थान पहुंचे सुप्रीम कोर्ट, क्या है उनकी मांग?
भारत में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP), 2023 को लेकर देश के 21 प्रमुख समाचार प्रकाशकों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने अक्टूबर 2026 में याचिका दाखिल कर कानून और उसके नियमों के कई प्रावधानों को चुनौती दी है। एसोसिएशन में नेटवर्क18, एनडीटीवी, द इंडियन एक्सप्रेस, द हिंदू, टाइम्स ग्रुप और इंडिया टुडे जैसे प्रमुख मीडिया संस्थान शामिल हैं।
समाचार प्रकाशकों की सबसे बड़ी मांग है कि खोजी पत्रकारिता और सार्वजनिक हित से जुड़ी रिपोर्टिंग के लिए कानून में स्पष्ट कानूनी छूट दी जाए। उनका कहना है कि व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल से संबंधित सहमति, सूचना देने और डेटा मिटाने के प्रावधान भविष्य में स्वतंत्र पत्रकारिता के सामने गंभीर चुनौतियां पैदा कर सकते हैं। 27 अक्टूबर 2026 को वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने एसोसिएशन की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दलीलें पेश कीं। उन्होंने कहा कि यदि किसी पत्रकार को भ्रष्टाचार या घोटाले की जांच करने से पहले संबंधित व्यक्ति की सहमति लेनी पड़े, तो स्वतंत्र रिपोर्टिंग प्रभावित होगी।
याचिका में यह चिंता भी जताई गई कि जानकारी मिटाने के अनुरोधों से प्रकाशित समाचार प्रभावित हो सकते हैं। इसके अलावा गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर होने, सरकार की सूचना मांगने की शक्तियों और भारी आर्थिक दंड के प्रावधानों पर भी सवाल उठाए गए हैं। एसोसिएशन का तर्क है कि समाचार संस्थान पहले से मानहानि, निजता, प्रेस और डिजिटल मीडिया से संबंधित विभिन्न कानूनों के तहत जवाबदेह हैं। गलत रिपोर्टिंग पर कानूनी कार्रवाई और खबर प्रकाशित करने से पहले अनुमति लेना दो अलग-अलग बातें हैं।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि नागरिकों की निजता और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा, लेकिन बिना सरकार का पक्ष सुने अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को निर्धारित है। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या पत्रकारिता को DPDP कानून में विशेष छूट मिलेगी या मीडिया संस्थानों को सामान्य डेटा संरक्षण नियमों के दायरे में काम करना होगा।सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? निजता और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP), 2023 को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि नागरिकों की निजता और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता के साथ आम नागरिकों की व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा भी सुनिश्चित होनी चाहिए।
27 अक्टूबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) की याचिका पर सुनवाई की। याचिका में DPDP कानून के कई प्रावधानों को चुनौती देते हुए आशंका जताई गई कि इनके कारण खोजी पत्रकारिता और स्वतंत्र समाचार रिपोर्टिंग प्रभावित हो सकती है।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने समाचार प्रकाशकों की ओर से दलील दी कि यदि पत्रकारों को किसी भ्रष्टाचार या अनियमितता की जांच करने से पहले संबंधित व्यक्ति की सहमति पर निर्भर रहना पड़े, तो स्वतंत्र पत्रकारिता के सामने गंभीर चुनौतियां पैदा हो सकती हैं। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि निर्दोष नागरिकों के भी अधिकार हैं और उनकी निजता की अनदेखी नहीं की जा सकती। अदालत ने समाचार प्रकाशकों से ऐसे व्यावहारिक सुरक्षा उपाय सुझाने को कहा, जिनसे पत्रकारिता की स्वतंत्रता बनी रहे और व्यक्तिगत डेटा का दुरुपयोग भी रोका जा सके।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर याचिका पर जवाब मांगा। इसके अलावा विवादित प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाने की मांग वाली अर्जी पर भी नोटिस जारी किया गया। हालांकि अदालत ने सरकार का पक्ष सुने बिना तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि दूसरे पक्ष को सुनने के बाद ही इस संबंध में निर्णय लिया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को निर्धारित है। इस दौरान केंद्र सरकार का जवाब और समाचार प्रकाशकों के संभावित सुझाव महत्वपूर्ण होंगे। यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि इसका अंतिम निर्णय भविष्य में नागरिकों के डेटा संरक्षण, खोजी पत्रकारिता और प्रेस की संवैधानिक स्वतंत्रता के बीच कानूनी संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
केंद्र सरकार ने क्या कहा?
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP), 2023 को लेकर पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर उठ रहे सवालों के बीच केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस कानून का उद्देश्य मीडिया की आजादी को सीमित करना नहीं है। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भरोसा दिलाया कि भारतीय संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता को संरक्षण प्राप्त है और सरकार की इसे प्रभावित करने की कोई मंशा नहीं है।
28 अक्टूबर 2026 को समाचार प्रकाशकों की सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर प्रतिक्रिया देते हुए अश्विनी वैष्णव ने कहा कि DPDP कानून पत्रकारिता की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं करता। उन्होंने स्पष्ट किया कि संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों को किसी सामान्य कानून के माध्यम से समाप्त नहीं किया जा सकता।
केंद्रीय मंत्री ने समाचार संस्थानों के संपादकों और मीडिया प्रतिनिधियों को बातचीत के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने कहा कि सरकार उनकी चिंताओं को सुनने और संभावित समाधान पर चर्चा करने के लिए तैयार है। सरकार ने पत्रकारिता की स्वतंत्रता से जुड़े सुझावों पर विचार करने की इच्छा भी जताई है।
अश्विनी वैष्णव ने बताया कि DPDP कानून बनाने का मुख्य उद्देश्य नागरिकों की व्यक्तिगत जानकारी और निजता के अधिकार की सुरक्षा करना है। वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक पुट्टस्वामी फैसले में निजता को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी थी। इसी संवैधानिक सिद्धांत के आधार पर डेटा संरक्षण के लिए कानूनी व्यवस्था तैयार की गई है।
हालांकि डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) सहित समाचार प्रकाशकों की चिंताएं अभी समाप्त नहीं हुई हैं। उनका कहना है कि केवल सरकारी आश्वासन पर्याप्त नहीं है। कानून में सार्वजनिक हित की खोजी पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट और सुरक्षा उपाय भी होने चाहिए।
मीडिया संस्थानों को आशंका है कि सहमति, व्यक्तिगत डेटा मिटाने और गोपनीय सूत्रों से संबंधित प्रावधान भविष्य में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की जांच को प्रभावित कर सकते हैं। अब इस विवाद का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सरकार और समाचार प्रकाशक किस प्रकार ऐसी कानूनी व्यवस्था पर सहमत होते हैं, जिसमें नागरिकों की निजता सुरक्षित रहे और स्वतंत्र पत्रकारिता भी बिना अनावश्यक बाधाओं के अपना काम कर सके।
क्या दूसरे देशों में पत्रकारों को डेटा संरक्षण कानून में छूट है?
दुनिया के कई देशों में डेटा संरक्षण कानूनों के अंतर्गत पत्रकारिता के लिए विशेष कानूनी छूट का प्रावधान है। इसका उद्देश्य नागरिकों की व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा के साथ प्रेस की स्वतंत्रता और सार्वजनिक हित में की जाने वाली खोजी पत्रकारिता को संरक्षण देना है। हालांकि ये छूट बिना किसी शर्त के नहीं मिलती। यूरोपीय संघ में लागू जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (GDPR) के अनुच्छेद 85 में पत्रकारिता, साहित्यिक, शैक्षणिक और कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। इसके तहत सदस्य देशों को डेटा संरक्षण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए आवश्यक कानूनी अपवाद प्रदान करने होते हैं।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भ्रष्टाचार, सरकारी अनियमितताओं और सार्वजनिक महत्व के मामलों की रिपोर्टिंग केवल व्यक्तिगत डेटा संबंधी प्रतिबंधों के कारण प्रभावित न हो। हालांकि पत्रकारों को भी नागरिकों की निजता और जिम्मेदार रिपोर्टिंग के मानकों का ध्यान रखना होता है। ब्रिटेन के डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2018 में भी पत्रकारिता के लिए विशेष छूट मौजूद है। कानून की अनुसूची 2 के भाग 5 में ऐसी व्यवस्था है, जिसके तहत कुछ डेटा संरक्षण दायित्वों से राहत मिल सकती है।
इसके लिए समाचार प्रकाशक के पास यह विश्वास करने का उचित आधार होना चाहिए कि संबंधित जानकारी का प्रकाशन सार्वजनिक हित में है और सामान्य डेटा संरक्षण नियमों का पालन पत्रकारिता के उद्देश्य से असंगत होगा। इसका अर्थ यह नहीं है कि ब्रिटेन में पत्रकार किसी की भी निजी जानकारी बिना कारण प्रकाशित कर सकते हैं। जरूरत पड़ने पर समाचार संस्थानों को सार्वजनिक हित से संबंधित अपने निर्णय का औचित्य स्पष्ट करना पड़ सकता है।
भारत में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP), 2023 को लेकर भी इसी प्रकार की व्यवस्था की मांग उठ रही है। डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन सहित समाचार प्रकाशकों का कहना है कि कानून में खोजी पत्रकारिता और सार्वजनिक हित की रिपोर्टिंग के लिए स्पष्ट छूट होनी चाहिए। मीडिया संस्थानों की मांग है कि नागरिकों की निजता की सुरक्षा के साथ भ्रष्टाचार, सरकारी अनियमितताओं और सत्ता से जुड़े मामलों की स्वतंत्र जांच भी सुरक्षित रहे। अब महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या भारत में भी यूरोप और ब्रिटेन की तरह पत्रकारिता के लिए विशेष कानूनी सुरक्षा की व्यवस्था की जाएगी।
संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के बीच क्यों खड़ा हुआ विवाद?
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP), 2023 को लेकर देश में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक बहस शुरू हो गई है। यह विवाद भारतीय संविधान के दो प्रमुख मौलिक अधिकारों, अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 21, से जुड़ा है। एक तरफ पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल है, तो दूसरी तरफ नागरिकों की निजता और व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा का अधिकार है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने विभिन्न फैसलों में प्रेस की स्वतंत्रता को इसी संवैधानिक अधिकार का महत्वपूर्ण हिस्सा माना है। इसके तहत पत्रकारों को सार्वजनिक महत्व के मामलों की जांच करने, सरकार से सवाल पूछने और प्रमाणित जानकारी जनता तक पहुंचाने की स्वतंत्रता प्राप्त है।
दूसरी ओर संविधान का अनुच्छेद 21 नागरिकों के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। 24 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने ऐतिहासिक पुट्टस्वामी फैसले में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी थी। इस फैसले ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत जानकारी, गरिमा और निजता की रक्षा करना संवैधानिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
अब DPDP कानून को लेकर विवाद इसलिए पैदा हुआ है क्योंकि समाचार प्रकाशकों को आशंका है कि व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल पर लागू होने वाले नियम खोजी पत्रकारिता को प्रभावित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, भ्रष्टाचार या सरकारी घोटाले की जांच में किसी अधिकारी की व्यक्तिगत जानकारी सामने आती है, तो पत्रकारिता की स्वतंत्रता और संबंधित व्यक्ति की निजता के अधिकार के बीच टकराव हो सकता है।
हालांकि दोनों अधिकार महत्वपूर्ण हैं और कोई भी असीमित नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 19(2) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर निर्धारित आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है। सुप्रीम कोर्ट के सामने अब महत्वपूर्ण सवाल यह है कि विवादित प्रावधान वैध उद्देश्य की पूर्ति करते हैं या नहीं और पत्रकारिता पर उनका संभावित प्रभाव आवश्यक तथा अनुपातिक है या नहीं। इस मामले का अंतिम न्यायिक निर्णय नागरिकों की निजता, प्रेस की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक जवाबदेही के बीच संवैधानिक संतुलन निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
छोटे और स्वतंत्र पत्रकारों के लिए चुनौती क्यों ज्यादा गंभीर हो सकती है?
DPDP कानून का असर केवल बड़े मीडिया समूहों तक सीमित रहने की आशंका नहीं है। भारत में हजारों स्वतंत्र पत्रकार, क्षेत्रीय समाचार वेबसाइटें, डिजिटल न्यूज चैनल और छोटे मीडिया संस्थान स्थानीय प्रशासन, भ्रष्टाचार, सरकारी योजनाओं तथा नागरिक समस्याओं की रिपोर्टिंग करते हैं। इनमें से कई संस्थानों के पास बड़े कानूनी विभाग या डेटा संरक्षण विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं होते।
यदि किसी समाचार संस्थान को अपने रिकॉर्ड का वर्गीकरण करने, डेटा सुरक्षा के लिए नई तकनीकी व्यवस्थाएं विकसित करने और हर शिकायत का कानूनी जवाब देने की आवश्यकता पड़े, तो उसके संचालन का खर्च बढ़ सकता है। उदाहरण के लिए, किसी छोटे जिले का पत्रकार यदि मनरेगा भुगतान में अनियमितताओं की जांच करता है, तो उसे मजदूरों, भुगतान सूची और सरकारी रिकॉर्ड का विश्लेषण करना पड़ सकता है।
इसी तरह भूमि घोटाले की जांच में जमीन के स्वामित्व और अधिकारियों के निर्णयों से जुड़े दस्तावेज आवश्यक हो सकते हैं। यदि इन दस्तावेजों के वैध इस्तेमाल को लेकर कानूनी अनिश्चितता बनी रहती है, तो स्वतंत्र पत्रकारों के सामने अतिरिक्त जोखिम पैदा हो सकते हैं। हालांकि यह संभावित प्रभाव है, न कि इस बात का प्रमाण कि DPDP कानून ने सभी स्थानीय पत्रकारों को ऐसी जांच करने से रोक दिया है। मुख्य प्रावधान मई 2027 में लागू होने निर्धारित हैं। इसलिए अभी इस विषय पर स्पष्ट कानूनी दिशा-निर्देश तैयार करने की गुंजाइश मौजूद है।
डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून का मूल उद्देश्य नागरिकों की निजता की रक्षा करना है। तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल और व्यक्तिगत जानकारी के दुरुपयोग के जोखिम को देखते हुए प्रभावी डेटा संरक्षण व्यवस्था का महत्व स्पष्ट है। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में पत्रकारिता की स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। स्वतंत्र मीडिया सरकारी फैसलों की जांच करता है, भ्रष्टाचार के आरोपों की पड़ताल करता है और सार्वजनिक संस्थाओं को जवाबदेह बनाने में भूमिका निभाता है।
समाचार प्रकाशकों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट अपवाद नहीं होने से कुछ परिस्थितियों में खोजी रिपोर्टिंग, गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा और पुराने समाचारों के अभिलेख प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि कानून का उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाना नहीं है और नागरिकों की निजता की रक्षा करना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है।




