
इजरायल चुनाव 2026: नेतन्याहू बहुमत से दूर, अरब पार्टियां बनीं किंगमेकर
प्रधानमंत्री नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने चुनाव में सबसे अधिक 27 सीटें प्राप्त की हैं। हालांकि, इजरायल की संसदीय व्यवस्था में केवल सबसे बड़ी पार्टी बनना सरकार गठन की गारंटी नहीं है।नेतन्याहू के साथ लिकुड, शास, यूनाइटेड तोराह जूडाइज्म, ओत्जमा येहुदित और रिलिजियस जायोनिज्म–जेहुत का गठबंधन है।

LIVE 24 TV | अंतरराष्ट्रीय समाचार | 30 अक्टूबर 2026
इजरायल में 27 अक्टूबर को हुए संसदीय चुनाव की मतगणना पूरी हो गई है, लेकिन प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाला गठबंधन पूर्ण बहुमत हासिल नहीं कर पाया है। उनकी लिकुड पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सीटों के आंकड़े से उनका गठबंधन आठ सीट पीछे रह गया है।
इजरायल की 120 सदस्यीय संसद, जिसे नेसेट (Knesset) कहा जाता है, में नेतन्याहू समर्थक दलों को 53 सीटें मिली हैं। दूसरी ओर पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी दलों ने 48 सीटें हासिल की हैं। सबसे महत्वपूर्ण परिणाम अरब नेतृत्व वाली पार्टियों का रहा है, जिन्होंने कुल 19 सीटें जीती हैं। इससे नई सरकार के गठन में इन दलों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है।
इजरायल चुनाव 2026: चुनाव के प्रमुख आंकड़े
इजरायल में 27 अक्टूबर 2026 को हुए संसदीय चुनाव की मतगणना पूरी हो चुकी है। केंद्रीय चुनाव आयोग के अनुसार, इस बार 77.9 प्रतिशत मतदान हुआ और कुल 57,16,665 वोट डाले गए। इनमें 56,90,778 वोट वैध और 25,887 वोट अमान्य घोषित हुए। इजरायल की 120 सदस्यीय संसद नेसेट में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों का बहुमत जरूरी है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 27 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। गादी आइजेनकोट की याशार पार्टी को 21, बियाचाद को 12 और जॉइंट लिस्ट को 11 सीटें मिलीं।
इसके अलावा डेमोक्रेट्स और राम पार्टी को 8-8, जबकि यिसराइल बेतेनु, यूनाइटेड तोरा जुडाइज्म और ओत्जमा येहुदित को 7-7 सीटें मिलीं। शास और रिलीजियस जायनिज्म को 6-6 सीटें हासिल हुईं। सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा राजनीतिक गठबंधनों का है। नेतन्याहू समर्थक गठबंधन को 53, विपक्षी गठबंधन को 48 और अरब पार्टियों को कुल 19 सीटें मिली हैं। चुनाव परिणामों का औपचारिक सत्यापन पूरा होने के बाद इन्हें 4 नवंबर 2026 को राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग को सौंपा जाएगा। नई संसद 10 नवंबर को शपथ लेगी। अब अगली सरकार के गठन में अरब पार्टियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
नेतन्याहू की लिकुड सबसे बड़ी पार्टी, फिर भी सरकार बनाने में मुश्किल
इजरायल के संसदीय चुनाव 2026 में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी है। पार्टी ने 120 सदस्यीय संसद नेसेट में सर्वाधिक 27 सीटें हासिल की हैं। हालांकि, चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद नेतन्याहू के सामने दोबारा सरकार बनाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
इजरायल में सरकार गठन के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है। नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन में लिकुड के अलावा शास, यूनाइटेड तोराह जूडाइज्म, ओत्जमा येहुदित और रिलिजियस जायोनिज्म शामिल हैं। इन पांचों दलों को कुल 53 सीटें मिली हैं। यानी सरकार बनाने के लिए गठबंधन को अभी आठ अतिरिक्त सांसदों के समर्थन की आवश्यकता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पिछली संसद में नेतन्याहू समर्थक गठबंधन के पास 68 सीटें थीं, लेकिन इस चुनाव में उसकी ताकत 15 सीटें घट गई है। इससे इजरायल की राजनीति में नए गठबंधनों और सत्ता परिवर्तन की संभावनाओं पर चर्चा तेज हो गई है। दूसरी तरफ गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें मिली हैं। वहीं, अरब नेतृत्व वाली जॉइंट लिस्ट और राम पार्टी ने मिलकर 19 सीटें हासिल की हैं।
यदि विपक्ष के 48 और अरब पार्टियों के 19 सांसद एकजुट हो जाएं, तो उनके पास गणितीय रूप से 67 सीटों का बहुमत हो सकता है। हालांकि, विपक्ष के कई दल अरब पार्टियों के साथ गठबंधन करने का विरोध कर चुके हैं। इसलिए यह समीकरण राजनीतिक सहमति के बिना संभव नहीं है।
अरब पार्टियों की 19 सीटें, सरकार गठन में अहम भूमिका
इस चुनाव का एक महत्वपूर्ण पहलू अरब नेतृत्व वाले दलों का प्रदर्शन है। जॉइंट लिस्ट ने 11 सीटें जीतीं, जबकि मंसूर अब्बास की राम पार्टी को 8 सीटें मिली हैं। दोनों ने मिलकर कुल 19 सीटें हासिल कीं। पिछली संसद में इन दलों के पास संयुक्त रूप से 10 सीटें थीं।
जॉइंट लिस्ट का नेतृत्व यूसुफ जबारीन कर रहे हैं। इसमें अरब समुदाय से जुड़े विभिन्न राजनीतिक समूह शामिल हैं। वहीं मंसूर अब्बास की राम पार्टी अलग चुनाव लड़ती है और उसकी राजनीतिक रणनीति भी जॉइंट लिस्ट से अलग रही है। अरब मतदाताओं की अधिक भागीदारी, समुदाय से जुड़े मुद्दों और नेतन्याहू सरकार को लेकर असंतोष ने इन दलों के प्रदर्शन में योगदान दिया।
अब सवाल यह है कि क्या ये पार्टियां किसी विपक्षी गठबंधन को सरकार बनाने में समर्थन देंगी? गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले दलों के पास 48 सीटें हैं। सभी 19 अरब सांसदों का समर्थन मिलने पर यह संख्या 67 हो जाएगी, जो बहुमत से छह अधिक है। लेकिन यह केवल सीटों का गणित है। विपक्षी गठबंधन के कई नेताओं ने अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाने पर आपत्ति जताई है। दूसरी ओर डेमोक्रेट्स के नेता यायर गोलान इस तरह के राजनीतिक सहयोग के पक्ष में हैं। ऐसे में अरब दल सरकार में शामिल हुए बिना भी कुछ संसदीय फैसलों में विपक्ष का साथ दे सकते हैं। विशेष रूप से संसद के अध्यक्ष के चुनाव में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
गादी आइजेनकोट कौन हैं और उनकी पार्टी का प्रदर्शन कैसा रहा?
इजरायल चुनाव 2026 में पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट एक प्रमुख राजनीतिक चेहरे बनकर उभरे हैं। उनकी नई राजनीतिक पार्टी याशार ने 21 सीटें जीतकर संसद में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी का स्थान हासिल किया है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को 27 सीटें मिली हैं।
गादी आइजेनकोट इजरायली सेना के पूर्व प्रमुख रह चुके हैं। उन्होंने अपने चुनाव अभियान में राष्ट्रीय सुरक्षा, सरकारी जवाबदेही, प्रशासनिक सुधार और राजनीतिक स्थिरता जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी। उनका उद्देश्य नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन के विकल्प के रूप में नई सरकार बनाने का रहा है। आइजेनकोट के विपक्षी गठबंधन में पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट, यायर गोलान और अविगडोर लिबरमैन जैसे प्रमुख नेता शामिल हैं।
नफ्ताली बेनेट की बियाखाद पार्टी को 12 सीटें, यायर गोलान की डेमोक्रेट्स को 8 सीटें और लिबरमैन की इस्राइल बेतेनू को 7 सीटें मिली हैं। इन चारों दलों के पास कुल 48 सीटें हैं। हालांकि, सरकार बनाने के लिए 61 सीटों का बहुमत जरूरी है। विपक्षी दलों के बीच सैन्य सेवा, धार्मिक समुदायों को मिलने वाली छूट, अरब पार्टियों से सहयोग और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर मतभेद हैं। ऐसे में आइजेनकोट के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्षी दलों के बीच सहमति बनाकर सरकार गठन के लिए पर्याप्त समर्थन जुटाने की है।
किन मुद्दों पर हुआ सबसे ज्यादा मुकाबला?
इजरायल के संसदीय चुनाव 2026 में राष्ट्रीय सुरक्षा, हमास के हमले की जांच, गाजा युद्ध और सरकार की जवाबदेही सबसे बड़े चुनावी मुद्दे रहे। यह 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले और उसके बाद हुए व्यापक सैन्य संघर्षों के बाद देश का पहला संसदीय चुनाव था। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने चुनाव प्रचार में अपनी सरकार की सैन्य कार्रवाइयों और राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी फैसलों को प्रमुखता दी। उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ कठोर नीति और इजरायल की सुरक्षा सुनिश्चित करने के अपने रुख पर जोर दिया।
दूसरी ओर, पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट सहित विपक्षी नेताओं ने 7 अक्टूबर के हमले के दौरान हुई सुरक्षा चूक, खुफिया तंत्र की विफलता और सरकार की जवाबदेही को बड़ा मुद्दा बनाया। विपक्ष ने हमले की स्वतंत्र जांच कराने और शासन व्यवस्था में सुधार की मांग उठाई। चुनाव में अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट का मुद्दा भी काफी विवादित रहा। इजरायल में अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदाय के कुछ लोगों को सैन्य सेवा से मिलने वाली छूट पर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद सामने आए।
विपक्ष ने इस व्यवस्था में बदलाव की मांग की, जबकि नेतन्याहू के सहयोगी धार्मिक दल इसे बनाए रखने के पक्ष में रहे। इन मुद्दों ने चुनावी मुकाबले को सुरक्षा, सामाजिक समानता और राजनीतिक जवाबदेही के सवालों पर केंद्रित कर दिया।
धांधली के आरोपों से सियासी घमासान
इजरायल के संसदीय चुनाव 2026 के नतीजे सामने आने के बाद देश में चुनावी धांधली और विदेशी हस्तक्षेप के आरोपों को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने अरब नेतृत्व वाले राजनीतिक दलों पर मतदान में अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगाए हैं। लिकुड पार्टी का दावा है कि कुछ मतदान केंद्रों पर मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए रिश्वत, धमकी और अन्य गैरकानूनी तरीकों का इस्तेमाल किया गया। पार्टी ने पुलिस और चुनाव अधिकारियों को शिकायतें सौंपने की बात कही है। हालांकि, व्यापक चुनावी धांधली के आरोपों की पुष्टि करने वाले ठोस सार्वजनिक प्रमाण सामने नहीं आए हैं
इजरायल की केंद्रीय चुनाव समिति के अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश नोआम सोलबर्ग ने संभावित विदेशी हस्तक्षेप से संबंधित खुफिया जानकारी की जांच करने के लिए सुरक्षा एजेंसी शिन बेट को निर्देश दिया है। इस विवाद में कतर का नाम भी सामने आया है। कुछ रिपोर्टों में आरोप लगाया गया कि विदेशी धन का इस्तेमाल अरब समुदाय के मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए किया गया। हालांकि, कतर ने चुनाव में किसी भी तरह के हस्तक्षेप या वित्तीय सहायता देने के आरोपों को खारिज किया है।
दूसरी ओर, शिन बेट ने स्पष्ट किया है कि उसकी जांच सीमित दायरे में है और इसका उद्देश्य किसी पूरे समुदाय को संदेह के घेरे में लाना नहीं है। एजेंसी के अनुसार, जांच स्वतंत्र खुफिया जानकारी के आधार पर की जा रही है। चुनाव समिति ने भी कहा है कि व्यवस्थित चुनावी धांधली के दावों का कोई प्रमाण नहीं मिला है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जांच के बावजूद चुनाव परिणामों की औपचारिक प्रक्रिया जारी रहेगी। नतीजे 4 नवंबर 2026 को राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग को सौंपे जाने हैं। फिलहाल जांच के निष्कर्ष सामने आने बाकी हैं।

अब कैसे बनेगी इजरायल की नई सरकार?
इजरायल में संसदीय चुनावों की मतगणना पूरी होने के बाद अब नई सरकार के गठन की प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो जाती है। देश की राजनीतिक व्यवस्था में राष्ट्रपति की भूमिका सरकार बनाने की जिम्मेदारी सौंपने की होती है, जबकि प्रधानमंत्री बनने के लिए संसद का विश्वास हासिल करना जरूरी है। चुनाव परिणाम आधिकारिक रूप से प्रकाशित होने के सात दिनों के भीतर राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से मुलाकात करेंगे। इस दौरान प्रत्येक दल बताएगा कि वह किस सांसद को प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन देना चाहता है। राष्ट्रपति इन सिफारिशों और संभावित गठबंधन की स्थिति का आकलन करके किसी सांसद को सरकार बनाने की जिम्मेदारी सौंपेंगे।
इजरायल की संसद नेसेट में कुल 120 सदस्य होते हैं। स्थिर बहुमत वाली सरकार बनाने के लिए आमतौर पर कम से कम 61 सांसदों का समर्थन महत्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने पर छोटे दलों की भूमिका निर्णायक हो सकती है। सरकार गठन के लिए पहले उम्मीदवार को 28 दिनों का समय दिया जाता है। आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्रपति अधिकतम 14 दिनों का अतिरिक्त समय दे सकते हैं। इस प्रकार पहले उम्मीदवार को कुल 42 दिन मिल सकते हैं।
यदि पहला उम्मीदवार सरकार बनाने में असफल रहता है, तो राष्ट्रपति किसी दूसरे सांसद को अवसर दे सकते हैं। दूसरे उम्मीदवार को 28 दिन मिलेंगे, लेकिन समय बढ़ाने का प्रावधान नहीं है। दूसरा प्रयास विफल होने पर 21 दिनों के भीतर कम से कम 61 सांसद किसी तीसरे उम्मीदवार के नाम का प्रस्ताव रख सकते हैं। उसे सरकार बनाने के लिए 14 दिन दिए जाएंगे। यदि सभी प्रयास असफल रहते हैं, तो संसद भंग होने और 90 दिनों के भीतर दोबारा चुनाव कराने की स्थिति बन सकती है।
गठबंधन बनने के बाद प्रस्तावित सरकार को संसद में विश्वास मत हासिल करना होगा। इसके बाद ही नई सरकार औपचारिक रूप से कार्यभार संभालेगी। तब तक मौजूदा सरकार कार्यवाहक व्यवस्था के तहत जिम्मेदारियां निभाती रहेगी।
क्या नेतन्याहू दोबारा बन सकते हैं इजरायल के प्रधानमंत्री?
इजरायल के संसदीय चुनावों में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन उनके दोबारा प्रधानमंत्री बनने का रास्ता आसान नहीं है। चुनाव परिणामों के अनुसार लिकुड को 27 सीटें मिली हैं, जबकि नेतन्याहू समर्थक गठबंधन के पास कुल 53 सीटें हैं। इजरायल की 120 सदस्यीय संसद नेसेट में सरकार बनाने के लिए सामान्यतः 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है। ऐसे में नेतन्याहू को कम से कम आठ अतिरिक्त सांसदों का समर्थन जुटाना होगा।
नेतन्याहू के सामने सबसे बड़ी चुनौती मौजूदा गठबंधन से बाहर के दलों को अपने साथ लाने की है। वह विपक्षी दलों के साथ राजनीतिक समझौता करके सरकार बनाने का प्रयास कर सकते हैं। हालांकि, कई विपक्षी नेता चुनाव प्रचार के दौरान नेतन्याहू के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल होने से इनकार कर चुके हैं। ऐसे में गठबंधन की बातचीत कठिन होने की संभावना है।
दूसरी ओर विपक्षी नेता गादी आइजेनकोट के सामने भी बहुमत जुटाने की चुनौती है। उनके नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे को 48 सीटें मिली हैं। सरकार बनाने के लिए उन्हें अन्य दलों का समर्थन हासिल करना होगा। इस चुनाव में अरब नेतृत्व वाले दलों को कुल 19 सीटें मिली हैं। ये दल सरकार गठन की प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। विशेष रूप से आइजेनकोट के लिए इन दलों का समर्थन या बाहरी सहयोग सत्ता तक पहुंचने का रास्ता खोल सकता है।
अब राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग विभिन्न दलों से बातचीत करके सरकार बनाने की जिम्मेदारी किसी सांसद को सौंपेंगे। इस दौरान राजनीतिक समझौते और गठबंधन की संभावनाओं पर सबकी नजर रहेगी। फिलहाल नेतन्याहू के दोबारा प्रधानमंत्री बनने की संभावना बरकरार है, लेकिन इसका फैसला गठबंधन के समर्थन पर निर्भर करेगा। जब तक नई सरकार नहीं बन जाती, नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभाते रहेंगे।

4 नवंबर को अंतिम नतीजे, 10 नवंबर को नई संसद
इजरायल में संसदीय चुनावों की मतगणना पूरी होने के बाद अब नई सरकार के गठन की तैयारियां तेज हो गई हैं। चुनाव आयोग के निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, 4 नवंबर 2026 को अंतिम आधिकारिक परिणाम राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग के समक्ष प्रस्तुत किए जाएंगे। इसके बाद सरकार गठन की संवैधानिक प्रक्रिया शुरू होगी। इजरायल की केंद्रीय चुनाव समिति ने 30 अक्टूबर को मतगणना के परिणाम जारी कर दिए हैं। हालांकि, शिकायतों और संभावित त्रुटियों की अंतिम जांच के बाद नतीजों को औपचारिक रूप से राष्ट्रपति को सौंपा जाएगा। इस प्रक्रिया का उद्देश्य चुनाव परिणामों की विश्वसनीयता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना है।
10 नवंबर 2026 को इजरायल की नवनिर्वाचित 26वीं संसद यानी नेसेट का शपथ ग्रहण समारोह निर्धारित है। इस दौरान नवनिर्वाचित सांसद औपचारिक रूप से अपना कार्यभार संभालेंगे। हालांकि, संसद का गठन होने का अर्थ यह नहीं है कि उसी दिन नई सरकार भी बन जाएगी। चुनाव परिणामों के अनुसार, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 27 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी है। नेतन्याहू समर्थक गठबंधन को कुल 53 सीटें मिली हैं। वहीं, गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे के पास 48 सीटें हैं। अरब नेतृत्व वाले दलों ने कुल 19 सीटें हासिल की हैं।
इजरायल की 120 सदस्यीय संसद में बहुमत के लिए 61 सांसदों का समर्थन महत्वपूर्ण है। ऐसे में कोई भी प्रमुख राजनीतिक गठबंधन अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर पाया है। राष्ट्रपति राजनीतिक दलों से बातचीत करके उस सांसद को सरकार बनाने की जिम्मेदारी देंगे, जिसके पास समर्थन जुटाने की सबसे अधिक संभावना होगी। अब इजरायल की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नेतन्याहू दोबारा प्रधानमंत्री बनेंगे या विपक्षी दल नया राजनीतिक समीकरण तैयार करेंगे। फिलहाल नई सरकार का भविष्य गठबंधन की बातचीत और छोटे दलों के फैसलों पर निर्भर करेगा।
इजरायल में किसकी सरकार? भारत के लिए क्या बदलेगा समीकरण?
इजरायल के संसदीय चुनाव 2026 के नतीजों के बाद भारत और इजरायल के भविष्य के संबंधों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 27 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी है, लेकिन उनके गठबंधन को बहुमत नहीं मिला। ऐसे में नई सरकार का गठन भारत के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत और इजरायल के बीच रक्षा, कृषि, व्यापार और तकनीक के क्षेत्र में मजबूत साझेदारी है। इजरायल भारत को आधुनिक हथियार, ड्रोन, रडार और मिसाइल रक्षा तकनीक उपलब्ध कराने वाला महत्वपूर्ण सहयोगी है। नई सरकार के साथ रक्षा समझौतों और संयुक्त उत्पादन को बढ़ावा मिलने से भारत की सैन्य क्षमताएं मजबूत हो सकती हैं।
व्यापार के क्षेत्र में भी भारत को फायदा मिलने की संभावना है। वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच लगभग 3.93 अरब डॉलर का व्यापार हुआ। दोनों देश मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं। समझौता आगे बढ़ने से भारतीय कंपनियों को नए व्यापार और निवेश के अवसर मिल सकते हैं। अगर नेतन्याहू दोबारा प्रधानमंत्री बनते हैं, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनके पुराने राजनीतिक संबंध द्विपक्षीय सहयोग को आगे बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं। वहीं, गादी आइजेनकोट के नेतृत्व में सरकार बनने पर भी रक्षा और आर्थिक साझेदारी जारी रहने की संभावना है।
हालांकि, भारत के सामने कुछ चुनौतियां भी होंगी। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, ईरान के साथ संघर्ष और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि इजरायल में स्थिर सरकार बने और क्षेत्रीय शांति कायम रहे। इससे रक्षा सहयोग, व्यापार, कृषि तकनीक और निवेश के नए रास्ते खुल सकते हैं।




