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चुनाव आयोग की साख पर सियासी संग्राम: CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष लामबंद, भाजपा बोली—मतभेद ही लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली का प्रमाण

लोकतंत्र में चुनाव परिणाम जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण उस प्रक्रिया पर मतदाता का विश्वास भी है। अब इस विवाद की अगली परीक्षा संसद, न्यायिक प्रक्रिया और निर्वाचन आयोग द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले तथ्य तथा अभिलेख तय करेंगे।

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चुनाव आयोग की साख पर सियासी संग्राम: CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष लामबंद, भाजपा बोली—मतभेद ही लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली का प्रमाण

विशेष राजनीतिक समीक्षा | नई दिल्ली, 24 सितंबर 2026

देश की चुनावी व्यवस्था और निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता को लेकर राजनीतिक टकराव एक नए और गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अब विपक्ष के सीधे निशाने पर हैं। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी और वाम दलों सहित कई विपक्षी दलों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। विवाद के केंद्र में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े फैसले और निर्वाचन आयोग के भीतर कथित मतभेद हैं।

मामला उस मीडिया रिपोर्ट के बाद और गरमा गया जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले लगभग दस महीनों में विभिन्न फैसलों और आदेशों पर कम-से-कम 14 बार आपत्तियां दर्ज कीं। विपक्ष ने इसे आयोग के शीर्ष स्तर पर गंभीर असहमति का संकेत बताया है। दूसरी ओर निर्वाचन आयोग ने कहा है कि आंतरिक विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग टिप्पणियां और सुझाव सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं तथा अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।

विपक्ष का हमला—ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग

विपक्ष का हमला अब केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है। इंडिया गठबंधन मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में नया प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है। 24 सितंबर तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसका मसौदा तैयार किया जा रहा है और नोटिस अगले सप्ताह तक दिया जा सकता है।

कांग्रेस ने ज्ञानेश कुमार के तत्काल इस्तीफे की मांग की है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने उन पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के लिए काम करने जैसा गंभीर आरोप लगाया। यह कांग्रेस का राजनीतिक आरोप है; इसे किसी न्यायिक या स्वतंत्र जांच का स्थापित निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी कथित आंतरिक असहमति की रिपोर्ट सामने आने के बाद निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। विपक्ष का तर्क है कि यदि आयोग के भीतर ही निर्णय प्रक्रिया को लेकर आपत्तियां थीं, तो पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।

ममता का सबसे आक्रामक प्रहार—गिरफ्तारी तक की मांग

पूर्व पश्चिम बंगाल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस विवाद में अत्यंत कठोर रुख अपनाया है। उन्होंने ज्ञानेश कुमार को हटाने के साथ उनकी गिरफ्तारी और आपराधिक कार्यवाही की मांग की तथा कहा कि उनके मुख्य चुनाव आयुक्त बने रहने तक देशव्यापी विरोध जारी रहना चाहिए। तृणमूल नेता डेरेक ओ'ब्रायन ने भी लोकतंत्र बचाने के नाम पर CEC को हटाने की मांग की है। ये तृणमूल कांग्रेस के आरोप और राजनीतिक मांगें हैं, सिद्ध कानूनी निष्कर्ष नहीं।

इस राजनीतिक संघर्ष की पृष्ठभूमि में निर्वाचन आयोग का हालिया फैसला भी महत्वपूर्ण है, जिसमें तृणमूल कांग्रेस के आंतरिक विवाद के बीच पार्टी के मूल नाम और चुनाव चिह्न को अस्थायी रूप से रोक दिया गया। ममता बनर्जी ने इस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है।

अखिलेश यादव ने सर्वोच्च न्यायालय की ओर देखा

समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी आयोग की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाते हुए सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप की मांग की है। उनका आरोप है कि निर्वाचन आयोग में हस्तक्षेप लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करता है। उन्होंने उन सरकारों की वैधता पर भी राजनीतिक सवाल उठाए हैं जिनके चुनाव उस अवधि में हुए जब, उनके अनुसार, आयोग निष्पक्ष ढंग से काम नहीं कर रहा था।

आम आदमी पार्टी और वाम दलों ने भी ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग दोहराई है। आप नेता अरविंद केजरीवाल इससे भी आगे गए और गिरफ्तारी, अभियोजन तथा कुछ चुनावों को नए सिरे से कराने जैसी मांगें रखीं।

भाजपा का पलटवार—‘मतभेद हैं तो यही लोकतंत्र का प्रमाण’

भाजपा ने विपक्ष की व्याख्या को सिरे से खारिज किया है। सत्तारूढ़ दल का तर्क है कि निर्वाचन आयोग के सदस्यों के बीच किसी विषय पर अलग-अलग विचार सामने आना संस्था की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली को दर्शाता है।

भाजपा ने कथित आंतरिक मतभेदों को आयोग में ‘तानाशाही’ के प्रमाण के रूप में पेश करने के विपक्षी प्रयास पर सवाल उठाया है। पार्टी का कहना है कि यदि चुनाव आयुक्त स्वतंत्र रूप से अपनी राय और आपत्तियां दर्ज कर सकते हैं, तो यह अपने आप में संस्थागत विचार-विमर्श का संकेत है।

आयोग की सफाई भी महत्वपूर्ण

इस राजनीतिक शोर के बीच निर्वाचन आयोग का पक्ष इस पूरे विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है। आयोग ने इस धारणा को खारिज किया है कि कथित आपत्तियों से संस्था की निर्णय प्रक्रिया में टूट या गंभीर संकट सिद्ध होता है।

आयोग के अनुसार लिखित टिप्पणियां, सुझाव और अलग-अलग दृष्टिकोण संस्थागत विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं। उसका कहना है कि SIR सहित अंतिम आदेश और निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। वर्तमान आयोग में ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त तथा सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी चुनाव आयुक्त हैं।

असली सवाल—मतदाता किस पर भरोसा करे?

यह टकराव अब किसी एक अधिकारी या राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। विवाद के केंद्र में वह संस्था है जिसे सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए समान नियम लागू करने वाले संवैधानिक निर्णायक की भूमिका निभानी होती है।

विपक्ष के सामने चुनौती अपने आरोपों के समर्थन में सत्यापन योग्य साक्ष्य प्रस्तुत करने की है। केवल राजनीतिक आरोप अपने आप में चुनावी अनियमितता सिद्ध नहीं करते। वहीं निर्वाचन आयोग के सामने चुनौती यह है कि वह निर्णय प्रक्रिया, मतदाता सूची पुनरीक्षण और आंतरिक असहमति से जुड़े प्रश्नों पर इतनी स्पष्टता प्रस्तुत करे कि निष्पक्षता को लेकर संदेह की गुंजाइश न्यूनतम रहे।

इसलिए वर्तमान विवाद को केवल ‘विपक्ष की हताशा’ या केवल ‘आयोग की मिलीभगत’ मान लेना उपलब्ध तथ्यों से आगे जाना होगा। फिलहाल स्थापित तथ्य यह है कि आयोग के भीतर आपत्तियां दर्ज किए जाने की रिपोर्ट ने बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा किया है; विपक्ष CEC को हटाने के लिए संसदीय कदम उठाने की तैयारी कर रहा है; भाजपा आयोग की निर्णय प्रक्रिया का बचाव कर रही है; और स्वयं निर्वाचन आयोग का कहना है कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से हुए।

लोकतंत्र में चुनाव परिणाम जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण उस प्रक्रिया पर मतदाता का विश्वास भी है। अब इस विवाद की अगली परीक्षा संसद, न्यायिक प्रक्रिया और निर्वाचन आयोग द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले तथ्य तथा अभिलेख तय करेंगे।

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