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UP में हिंसा के आरोपियों की सरकारी नौकरी पर संकट! योगी सरकार की नई नीति पर घमासान

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UP में हिंसा के आरोपियों की सरकारी नौकरी पर संकट! योगी सरकार की नई नीति पर घमासान

LIVE 24 TV | उत्तर प्रदेश विशेष रिपोर्ट | 29 अक्टूबर 2026

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने सरकारी नौकरियों में भर्ती के लिए चरित्र सत्यापन (Character Verification) की नई नीति लागू कर दी है। इस नीति के तहत हिंसक गतिविधियों के जरिए मौजूदा व्यवस्था को बदलने का उद्देश्य रखने वाले संगठनों से सक्रिय रूप से जुड़े लोगों को सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य माना जा सकता है। हत्या, बलात्कार, आतंकवाद, पेपर लीक और संगठित अपराध जैसे गंभीर मामलों से जुड़े अभ्यर्थियों पर भी सख्त प्रावधान लागू होंगे।

हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि केवल किसी राजनीतिक विचारधारा से जुड़ने, एफआईआर दर्ज होने या जांच लंबित होने के आधार पर किसी अभ्यर्थी को अपने आप सरकारी नौकरी से वंचित नहीं किया जाएगा। 28 अक्टूबर को प्रमुख सचिव नियुक्ति एवं कार्मिक एम. देवराज की ओर से जारी इस नीति को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में विवाद शुरू हो गया है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने इसे युवाओं के विरोध प्रदर्शन के अधिकार से जोड़ते हुए सरकार पर सवाल उठाए हैं। वहीं, नई नीति का उद्देश्य गंभीर अपराधों से जुड़े लोगों की नियुक्ति रोकने के साथ चरित्र सत्यापन की प्रक्रिया को तेज और अधिक स्पष्ट बनाना बताया गया है।

आखिर क्या है योगी सरकार की नई भर्ती नीति?

उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी नियुक्तियों में चरित्र सत्यापन के लिए एक समान व्यवस्था निर्धारित की है। नई नीति सरकारी विभागों के साथ निगमों, परिषदों, शैक्षणिक संस्थानों, स्वायत्त निकायों, सार्वजनिक उपक्रमों, पंचायतों और स्थानीय निकायों की सीधी भर्ती पर लागू होगी। इस व्यवस्था के तहत चयनित उम्मीदवारों के पिछले आपराधिक रिकॉर्ड, घोषित गतिविधियों और उपलब्ध पुलिस अभिलेखों की जांच की जाएगी।

नीति में सबसे अधिक चर्चा उस प्रावधान की है, जिसमें हिंसक तरीकों से वर्तमान व्यवस्था को बदलने का घोषित उद्देश्य रखने वाले संगठनों की सदस्यता को नियुक्ति के लिए अयोग्यता का आधार बनाया गया है। इसके अतिरिक्त सरकार ने गंभीर अपराधों में दोषसिद्धि और कुछ निर्धारित मामलों में अदालत द्वारा आरोप तय होने को भी नियुक्ति के लिए महत्वपूर्ण माना है। यह बदलाव इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में जारी किया गया है।

क्या आंदोलन करने वाले छात्रों को सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी?

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की नई भर्ती नीति के बाद युवाओं और छात्रों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या धरना-प्रदर्शन या आंदोलन में हिस्सा लेने से सरकारी नौकरी मिलने में परेशानी होगी। सरकार के आदेश के अनुसार, केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शन, राजनीतिक विचारधारा या किसी रैली में शामिल होने के आधार पर अभ्यर्थी को सरकारी नौकरी से अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा। हालांकि, हिंसक तरीकों से मौजूदा व्यवस्था बदलने का घोषित उद्देश्य रखने वाले संगठनों से सक्रिय जुड़ाव नियुक्ति में बाधा बन सकता है।

नई नीति में कहा गया है कि 21 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद सत्यापन की तारीख से पिछले तीन वर्षों के भीतर ऐसी हिंसक गतिविधियों में भागीदारी सक्रिय संलिप्तता का प्रमाण मानी जा सकती है। हालांकि, संबंधित अवधि में आचरण में सकारात्मक बदलाव के ठोस प्रमाण मिलने पर इस धारणा पर पुनर्विचार किया जा सकता है। इस प्रावधान को लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने सरकार पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष को आशंका है कि नियमों की व्यापक व्याख्या से शांतिपूर्ण आंदोलन करने वाले युवाओं को भी परेशानी हो सकती है।

ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि प्रशासन शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और हिंसक गतिविधियों में सक्रिय लोगों के बीच अंतर कैसे निर्धारित करेगा। नई नीति का वास्तविक प्रभाव इसके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।

किन अपराधों में सरकारी नौकरी पर लग सकती है रोक?

नई नीति में कई गंभीर अपराधों और अनियमितताओं का उल्लेख है।

  • हत्या, बलवा और फिरौती के लिए अपहरण।

  • बलात्कार, दहेज हत्या और पॉक्सो अधिनियम से जुड़े गंभीर अपराध।

  • आतंकवादी गतिविधियां और संगठित अपराध।

  • सरकारी भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक और सॉल्वर गैंग से जुड़ी गतिविधियां।

  • फर्जी दस्तावेज तैयार करना या परीक्षा में किसी दूसरे की जगह शामिल होना।

  • भ्रष्टाचार, धनशोधन और गैंगस्टर कानून से जुड़े निर्धारित मामले।

  • डिजिटल अरेस्ट और यूपीआई के माध्यम से साइबर धोखाधड़ी।

इन मामलों में संबंधित अपराध की प्रकृति तथा कानूनी स्थिति के अनुसार अयोग्यता तय होगी। कुछ मामलों में अदालत द्वारा आरोप तय होना भी अयोग्यता का आधार हो सकता है, जबकि अन्य में दोषसिद्धि आवश्यक हो सकती है।

सिर्फ FIR दर्ज होने पर क्या सरकारी नौकरी चली जाएगी?

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने नई भर्ती नीति में अभ्यर्थियों को महत्वपूर्ण राहत दी है। नई व्यवस्था के अनुसार, किसी उम्मीदवार के खिलाफ केवल एफआईआर दर्ज होने या पुलिस जांच लंबित रहने के आधार पर उसे सरकारी नौकरी के लिए स्वतः अयोग्य घोषित नहीं किया जाएगा।

सरकार ने स्पष्ट किया है कि प्रत्येक मामले में अपराध की प्रकृति, उपलब्ध साक्ष्य, अदालत की कार्यवाही और संबंधित नियुक्ति नियमों को ध्यान में रखकर निर्णय लिया जाएगा। यदि किसी अभ्यर्थी को अदालत ने बरी कर दिया है या उसका मामला कानूनी समझौते के जरिए समाप्त हुआ है, तो निर्धारित शर्तों के तहत उसे भी राहत मिल सकती है। किशोर न्याय कानून के अंतर्गत आने वाले मामलों में भी स्वतः अयोग्यता लागू नहीं होगी।

हालांकि, नई नीति में एक महत्वपूर्ण शर्त रखी गई है। सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवारों को अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर, गिरफ्तारी, लंबित मुकदमे और आपराधिक मामलों की जानकारी सही-सही देनी होगी। यदि कोई उम्मीदवार जानबूझकर आपराधिक रिकॉर्ड छिपाता है या गलत जानकारी देता है, तो उसकी नियुक्ति रद्द की जा सकती है। उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी संभव है। सरकार के अनुसार, नई व्यवस्था का उद्देश्य निर्दोष अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा करते हुए गंभीर आपराधिक मामलों में निर्धारित नियमों के अनुसार निर्णय लेना है।

सपा का योगी सरकार पर हमला- 'यह अंग्रेजों जैसा कानून'

समाजवादी पार्टी ने सरकारी नौकरियों में चरित्र सत्यापन से जुड़े नए नियमों पर कड़ी आपत्ति जताई है। पार्टी प्रवक्ता उदयवीर सिंह ने इस फैसले की तुलना ब्रिटिश शासनकाल के कानूनों से करते हुए सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं। उदयवीर सिंह ने कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां प्रत्येक नागरिक को संविधान के तहत शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने और अपनी आवाज उठाने का अधिकार है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सरकारों का परिवर्तन चुनाव और संवैधानिक प्रक्रियाओं से होता है। ऐसे में किसी राजनीतिक विचारधारा या शांतिपूर्ण आंदोलन से जुड़े नागरिकों के अधिकार प्रभावित नहीं होने चाहिए।

सपा प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि योगी सरकार युवाओं को डराने और विरोध की आवाज दबाने वाली मानसिकता के साथ काम कर रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि किसी आंदोलन में शामिल व्यक्ति और हिंसक गतिविधियों में सक्रिय व्यक्ति के बीच अंतर कौन और किस आधार पर तय करेगा। समाजवादी पार्टी को आशंका है कि प्रशासनिक स्तर पर नियमों की व्यापक व्याख्या होने से शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले युवाओं की सरकारी नौकरी प्रभावित हो सकती है। हालांकि, सरकारी नीति में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन और हिंसक गतिविधियों में सक्रिय संलिप्तता के बीच अंतर रखा गया है।

कांग्रेस ने भी उठाए सवाल

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की नई भर्ती नीति को लेकर सियासी विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। समाजवादी पार्टी के बाद अब कांग्रेस ने भी सरकारी नौकरियों में चरित्र सत्यापन के नए नियमों पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस नेताओं ने आशंका जताई है कि इस नीति का असर विरोध प्रदर्शन करने वाले युवाओं, खासकर Gen-Z पीढ़ी पर पड़ सकता है।

कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि सरकार युवाओं के आंदोलनों को हिंसक गतिविधियों से जोड़कर उन्हें डराने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में युवाओं को अपनी मांगों के समर्थन में शांतिपूर्ण आंदोलन करने का अधिकार है। सुरेंद्र राजपूत ने आशंका जताई कि यदि किसी प्रदर्शन के दौरान युवाओं पर आपराधिक मुकदमे दर्ज होते हैं, तो भविष्य में सरकारी नौकरी पाने में उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

वहीं, कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने कहा कि किसी व्यक्ति की आपराधिक संलिप्तता का निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार होना चाहिए। उन्होंने सरकार की नई नीति को जरूरत से ज्यादा सख्त बताते हुए इस पर सवाल उठाए।

अब 30 दिनों में पूरा करना होगा पुलिस सत्यापन

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने नई भर्ती नीति के तहत चरित्र सत्यापन की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। अब सरकारी नौकरी के लिए चयनित उम्मीदवारों का पुलिस सत्यापन सामान्यतः 30 दिनों के भीतर पूरा करना होगा। इस फैसले का उद्देश्य नियुक्तियों में होने वाली अनावश्यक देरी को कम करना और भर्ती प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाना है।

नई व्यवस्था के अनुसार, जिला पुलिस और स्थानीय अभिसूचना इकाई (LIU) को सत्यापन का अनुरोध मिलने के 30 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट भेजनी होगी। निर्धारित समय में रिपोर्ट नहीं मिलने पर मामला गृह विभाग को भेजा जाएगा, जो रिपोर्ट उपलब्ध कराने के लिए आवश्यक कार्रवाई करेगा।

सरकार ने सत्यापन प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। सामान्य परिस्थितियों में पुलिस या LIU को उम्मीदवार के घर जाकर पूछताछ करने अथवा उसे व्यक्तिगत रूप से उपस्थित कराने की आवश्यकता नहीं होगी। उपलब्ध पुलिस रिकॉर्ड और संबंधित दस्तावेजों के आधार पर जांच की जाएगी। हालांकि विशेष परिस्थितियों में मौके पर जांच कराई जा सकती है।

यदि किसी उम्मीदवार के खिलाफ प्रतिकूल रिपोर्ट प्राप्त होती है, तो जिलाधिकारी को अंतिम संस्तुति भेजने से पहले अभ्यर्थी को अपना पक्ष रखने का अवसर देना होगा। यह सुनवाई ऑनलाइन या व्यक्तिगत रूप से हो सकती है। इसके अतिरिक्त सत्यापन लंबित होने पर निर्धारित शर्तों के साथ औपबंधिक नियुक्ति पत्र भी जारी किया जा सकेगा। सरकार का कहना है कि इन बदलावों से पात्र उम्मीदवारों को नियुक्ति मिलने में अनावश्यक देरी नहीं होगी और चरित्र सत्यापन प्रक्रिया अधिक जवाबदेह बनेगी।

नई नीति का यह प्रावधान सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए महत्वपूर्ण है। अब चयनित उम्मीदवारों को पुलिस चरित्र सत्यापन की अंतिम रिपोर्ट आने से पहले भी औपबंधिक या प्रोविजनल नियुक्ति पत्र दिया जा सकेगा। इसके लिए उम्मीदवारों को निर्धारित स्व-घोषणा पत्र और आवश्यक दस्तावेज जमा करने होंगे। हालांकि, पुलिस, सुरक्षा और अन्य संवेदनशील पदों के लिए नियुक्ति से पहले विस्तृत जांच जरूरी रह सकती है। यदि नियुक्ति के बाद सत्यापन में उम्मीदवार अयोग्य पाया जाता है या गलत जानकारी देने का मामला सामने आता है, तो नियुक्ति रद्द हो सकती है।

भर्ती के दौरान उम्मीदवारों को किन बातों का ध्यान रखना होगा?

नई नीति के बाद अभ्यर्थियों को अपने आवेदन में पहले की गिरफ्तारी, अभियोजन, दोषसिद्धि और अन्य पूछी गई जानकारियों का सही विवरण देना होगा। यदि किसी व्यक्ति को पहले सरकारी सेवा से बर्खास्त किया जा चुका है या किसी भर्ती आयोग अथवा बोर्ड ने अनुचित साधनों के उपयोग पर प्रतिबंधित किया है, तो इसकी जानकारी भी देनी होगी। सत्यापन के लिए उम्मीदवार के गृह जिले के अतिरिक्त उन जिलों का रिकॉर्ड भी देखा जा सकता है, जहां वह पिछले पांच वर्षों में किसी समय एक वर्ष से अधिक रहा हो। पहले से सरकारी सेवा में कार्यरत कर्मचारियों के लिए नए सिरे से सामान्य चरित्र सत्यापन अनिवार्य नहीं किया गया है, हालांकि नियुक्ति प्राधिकारी आवश्यक जानकारी पिछले विभाग से ले सकता है।

उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरियों की परीक्षा, भर्ती प्रक्रिया, पेपर लीक और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर समय-समय पर छात्र संगठन विरोध प्रदर्शन करते रहे हैं। ऐसे में नई नीति के लागू होने के बाद छात्र संगठनों के सामने एक सवाल खड़ा हुआ है कि किसी प्रदर्शन के दौरान हिंसा होने पर उसमें मौजूद उम्मीदवार की व्यक्तिगत जिम्मेदारी कैसे निर्धारित होगी। यदि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले युवाओं और हिंसा में शामिल व्यक्तियों के बीच स्पष्ट अंतर किया जाता है, तो दोनों के मामलों का अलग-अलग मूल्यांकन संभव है।लेकिन यदि केवल किसी आंदोलन में उपस्थिति या संदिग्ध संबंध को आधार बनाया जाता है, तो निष्पक्ष चरित्र सत्यापन को लेकर विवाद बढ़ सकते हैं। यह नीति के संभावित व्यावहारिक प्रभाव का विश्लेषण है। किसी खास उम्मीदवार के विरुद्ध कार्रवाई हुई है, ऐसा दावा इसके आधार पर नहीं किया जा सकता।

संविधान के अनुसार विरोध प्रदर्शन का अधिकार क्या है?

भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी बात रखने, सरकार की नीतियों का विरोध करने और शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करने का अधिकार देता है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत शांतिपूर्ण तथा बिना हथियारों के सभा आयोजित करने का अधिकार प्राप्त है। हालांकि, ये अधिकार पूर्णतः असीमित नहीं हैं। सार्वजनिक व्यवस्था और देश की संप्रभुता एवं अखंडता जैसे आधारों पर कानून के अनुसार उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। ऐसे में शांतिपूर्ण आंदोलन और हिंसक गतिविधियों को एक समान नहीं माना जा सकता।

नई नीति के दो प्रमुख पहलू हैं। पहला, सरकार ने हिंसक गतिविधियों और गंभीर अपराधों से जुड़े निर्धारित मामलों में नियुक्ति के लिए सख्त मानदंड तय किए हैं। दूसरा, सत्यापन में देरी कम करने के लिए 30 दिन की समय-सीमा और प्रोविजनल नियुक्ति जैसी सुविधाएं दी गई हैं। विवाद इस बात पर है कि हिंसक गतिविधियों से संबंध साबित करने के मानदंडों का इस्तेमाल व्यवहार में कैसे किया जाएगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केवल किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल होने या किसी व्यक्ति पर एफआईआर दर्ज होने से उसकी सरकारी नौकरी स्वतः समाप्त होने का निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।

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