
अर्नब के बाद मुरासु का कहर! हफ्तेभर में दो चक्रवात, क्या सर्दी पर पड़ेगा असर?
चक्रवाती तूफान बनने के पीछे समुद्र और वायुमंडल की कई परिस्थितियां एक साथ काम करती हैं। बंगाल की खाड़ी लंबे समय से चक्रवातों के लिए संवेदनशील क्षेत्र रही है, विशेषकर मानसून के बाद अक्टूबर और नवंबर के महीनों में।

LIVE 24 TV | विशेष मौसम रिपोर्ट | 3 नवंबर 2026
बंगाल की खाड़ी में महज एक सप्ताह के भीतर दो शक्तिशाली चक्रवातों ने दस्तक देकर मौसम वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। अभी आंध्र प्रदेश और आसपास के इलाकों में चक्रवात अर्नब से हुए नुकसान की भरपाई भी नहीं हो पाई थी कि अब मुरासु ने समुद्र से उठकर तटीय इलाकों में तबाही का खतरा पैदा कर दिया। लगातार दो तूफानों के आने से सवाल उठ रहा है कि आखिर बंगाल की खाड़ी में ऐसा क्या हो रहा है कि एक के बाद एक चक्रवात बन रहे हैं? क्या समुद्र का बढ़ता तापमान इसकी वजह है? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल—क्या इन तूफानों का असर उत्तर भारत की सर्दी पर भी पड़ेगा?
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, गंभीर चक्रवाती तूफान मुरासु ने मंगलवार, 3 नवंबर की सुबह आंध्र प्रदेश के तट को पार किया। इस दौरान हवाओं की रफ्तार लगभग 100 से 110 किलोमीटर प्रति घंटा रही, जबकि तेज झोंकों की गति 120 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंची। तूफान अपने साथ भारी बारिश, तेज हवाएं और समुद्र में ऊंची लहरें लेकर आया। इससे पहले 28 अक्टूबर को अर्नब ने आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों को प्रभावित किया था। इस प्रकार सात दिनों से भी कम समय में एक ही क्षेत्र को दो चक्रवाती तूफानों का सामना करना पड़ा है।
अर्नब के बाद मुरासु ने मचाई हलचल, जानिए अब तक क्या हुआ
अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में बंगाल की खाड़ी में विकसित हुआ चक्रवात अर्नब 28 अक्टूबर को आंध्र प्रदेश के तट से टकराया। इस तूफान के कारण कई इलाकों में भारी वर्षा हुई, बिजली के खंभे और पेड़ उखड़ गए तथा कृषि भूमि को नुकसान पहुंचा। समाचार एजेंसी के अनुसार, अर्नब से कम से कम पांच लोगों की मौत हुई और लगभग दो लाख एकड़ कृषि भूमि प्रभावित हुई। अलग-अलग रिपोर्टों में मृतकों की संख्या में अंतर सामने आया है।
अर्नब के कमजोर पड़ने के बाद राहत एवं बचाव कार्य जारी थे कि बंगाल की खाड़ी में नया निम्न दबाव क्षेत्र विकसित होने लगा। 31 अक्टूबर को मौसम विभाग ने इस प्रणाली पर निगरानी शुरू की और 1 नवंबर को यह चक्रवाती तूफान मुरासु में बदल गया। इसके बाद समुद्री क्षेत्र की अनुकूल परिस्थितियों के कारण मुरासु तेजी से शक्तिशाली हुआ। 2 नवंबर तक यह गंभीर चक्रवाती तूफान बन चुका था।
3 नवंबर की सुबह मुरासु ने आंध्र प्रदेश के ओंगोल के पास तट को पार किया। तूफान के कारण भारी बारिश हुई और कई इलाकों में सामान्य जनजीवन प्रभावित हुआ। प्रशासन ने हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया तथा प्रभावित क्षेत्रों में स्कूल, रेल और विमान सेवाओं पर एहतियाती प्रतिबंध लगाए गए।
बंगाल की खाड़ी में आखिर ऐसा क्या हो रहा है कि लगातार बन रहे चक्रवात?
चक्रवाती तूफान बनने के पीछे समुद्र और वायुमंडल की कई परिस्थितियां एक साथ काम करती हैं। बंगाल की खाड़ी लंबे समय से चक्रवातों के लिए संवेदनशील क्षेत्र रही है, विशेषकर मानसून के बाद अक्टूबर और नवंबर के महीनों में। इस मौसम में समुद्र का पानी पर्याप्त गर्म रहता है और वातावरण में ऐसी परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं जो चक्रवातों को ऊर्जा प्रदान करती हैं।
आमतौर पर चक्रवात बनने के लिए समुद्र की सतह का तापमान करीब 26.5 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक होना अनुकूल माना जाता है। जब समुद्र गर्म होता है तो उससे अधिक जलवाष्प वातावरण में पहुंचती है। यह जलवाष्प ऊपर उठकर ठंडी होती है और बादल बनाती है। इस प्रक्रिया में गुप्त ऊष्मा निकलती है, जिससे तूफान के भीतर उठती हवाओं को और ऊर्जा मिलती है। यदि आसपास की हवाएं अनुकूल हों तो निम्न दबाव का क्षेत्र मजबूत होकर चक्रवात का रूप ले सकता है।
हालांकि केवल गर्म समुद्र ही चक्रवात बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है। वायुमंडलीय नमी, हवा की दिशा और गति में ऊंचाई के साथ बदलाव, पृथ्वी के घूर्णन से उत्पन्न प्रभाव तथा पहले से मौजूद निम्न दबाव क्षेत्र की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यही वजह है कि बंगाल की खाड़ी में कम अंतराल पर दो अलग-अलग मौसम प्रणालियां विकसित हो सकती हैं।
जलवायु परिवर्तन और समुद्र के बढ़ते तापमान को लेकर वैज्ञानिक लंबे समय से अध्ययन कर रहे हैं। गर्म समुद्री जल शक्तिशाली चक्रवातों के लिए अधिक ऊर्जा उपलब्ध करा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, समुद्र की सतह के साथ-साथ उसकी ऊपरी परतों में जमा गर्मी भी महत्वपूर्ण होती है। यदि समुद्र की गहराई तक पानी गर्म है तो तेज हवाओं से सतह के पानी के मिश्रित होने के बावजूद तूफान को ऊर्जा मिलती रह सकती है।
इसके अतिरिक्त गर्म वातावरण अधिक नमी धारण कर सकता है, जिससे चक्रवात के दौरान अत्यधिक वर्षा का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि अर्नब और मुरासु के लगातार बनने को सीधे जलवायु परिवर्तन का परिणाम घोषित करना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा। किसी एक घटना या कुछ दिनों के अंतराल में आए दो तूफानों के कारणों का निर्धारण करने के लिए समुद्र के तापमान, वायुमंडलीय परिस्थितियों और दीर्घकालिक आंकड़ों का विस्तृत अध्ययन जरूरी होता है। दोनों चक्रवातों का एक ही समुद्री क्षेत्र में बनना इस बात का संकेत जरूर है कि फिलहाल बंगाल की खाड़ी में चक्रवाती गतिविधियों के लिए अनुकूल परिस्थितियां मौजूद रही हैं।
मुरासु से किन राज्यों में भारी बारिश और तेज हवाओं का खतरा?
चक्रवात मुरासु का सबसे अधिक प्रभाव आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों पर पड़ा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने दक्षिणी आंध्र प्रदेश और उत्तरी तमिलनाडु के तटीय क्षेत्रों के लिए चेतावनी जारी की थी। तूफान के प्रभाव से आंध्र प्रदेश के प्रकाशम, बापटला, नेल्लोर और आसपास के जिलों में तेज हवाओं तथा भारी वर्षा का खतरा रहा। मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार, मुरासु से जुड़ी वर्षा का प्रभाव तेलंगाना, तमिलनाडु, दक्षिणी ओडिशा और छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों तक पहुंच सकता है।
तटीय इलाकों में समुद्र की सामान्य ज्वार ऊंचाई से लगभग 1 से 1.5 मीटर अतिरिक्त जलस्तर बढ़ने की चेतावनी दी गई थी। ऐसे में निचले इलाकों में समुद्री पानी भरने का खतरा बढ़ गया। तेज हवाओं के कारण कच्चे मकानों, बिजली के खंभों, पेड़ों और फसलों को नुकसान होने की आशंका रही। प्रशासन ने मछुआरों को समुद्र में नहीं जाने की सलाह दी और तटीय क्षेत्रों में राहत एवं बचाव दल तैनात किए।
ताजा रिपोर्टों के अनुसार, तूफान के तट पार करने के शुरुआती घंटों में पेड़ और बिजली के खंभे गिरने की घटनाएं सामने आईं। हालांकि तत्काल किसी मौत या घायल होने की पुष्टि नहीं हुई थी।
क्या लगातार दो चक्रवात आने से बदल जाएगा सर्दी का मौसम?
अर्नब और मुरासु के बाद सबसे बड़ा सवाल उत्तर भारत की सर्दी को लेकर उठ रहा है। नवंबर की शुरुआत के साथ दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में ठंड बढ़ने की प्रक्रिया शुरू होती है। ऐसे में बंगाल की खाड़ी में लगातार बन रहे तूफानों को देखकर आशंका जताई जा रही है कि कहीं इस बार सर्दी देर से तो नहीं आएगी। मौसम विज्ञान के अनुसार, चक्रवात आसपास के क्षेत्रों में तापमान, हवा की दिशा, बादलों और नमी की स्थिति को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन उनका प्रभाव हर क्षेत्र में एक जैसा नहीं होता।
जब कोई चक्रवात समुद्र से जमीन की ओर बढ़ता है तो वह बड़ी मात्रा में नमी लेकर आता है। इससे प्रभावित इलाकों में बादल छा जाते हैं और बारिश होने लगती है। बारिश और तेज हवाओं के कारण दिन के तापमान में गिरावट आ सकती है। दूसरी ओर, घने बादल रात में धरती से निकलने वाली ऊष्मा के कुछ हिस्से को रोकते हैं। इससे कई बार रात का तापमान सामान्य से अधिक बना रह सकता है। यही कारण है कि चक्रवाती परिस्थितियों में दिन ठंडा और रात अपेक्षाकृत गर्म महसूस हो सकती है।
लेकिन बंगाल की खाड़ी में बने किसी चक्रवात के कारण दिल्ली या पूरे उत्तर भारत की सर्दी निश्चित रूप से कमजोर या अधिक तेज होगी, ऐसा कहना सही नहीं होगा। इसके लिए तूफान का रास्ता और उत्तर भारत की अन्य मौसम प्रणालियों के साथ उसका संबंध देखना जरूरी है।
नवंबर की ठंड को लेकर मौसम विभाग ने क्या अनुमान दिया?
भारत मौसम विज्ञान विभाग ने 31 अक्टूबर को नवंबर 2026 के लिए तापमान और वर्षा का मासिक पूर्वानुमान जारी किया था। इसके अनुसार, नवंबर में देश के अधिकांश हिस्सों में अधिकतम तापमान सामान्य से ऊपर रहने की संभावना जताई गई है। हालांकि हिमालय की तलहटी के कुछ क्षेत्रों में अधिकतम तापमान सामान्य या उससे नीचे रह सकता है।
मौसम विभाग ने देश के अधिकांश हिस्सों में न्यूनतम तापमान भी सामान्य से अधिक रहने का अनुमान दिया है। वहीं मध्य और पूर्वी भारत के कई इलाकों में न्यूनतम तापमान सामान्य या उससे कम रहने की संभावना है। इस पूर्वानुमान का अर्थ है कि नवंबर में देश के कई हिस्सों में रातें सामान्य की तुलना में अपेक्षाकृत गर्म रह सकती हैं।
हालांकि यह एक पूरे महीने का सांख्यिकीय पूर्वानुमान है। इसके बीच कुछ दिनों के लिए तेज ठंड, बारिश या तापमान में अचानक गिरावट होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। महत्वपूर्ण बात यह है कि मौसम विभाग के नवंबर के तापमान पूर्वानुमान को केवल अर्नब और मुरासु चक्रवातों का परिणाम नहीं माना जा सकता।
उत्तर भारत में सर्दी बढ़ने की प्रक्रिया कई मौसम प्रणालियों पर निर्भर करती है। इनमें पश्चिमी विक्षोभ, हिमालय में बर्फबारी, उत्तर-पश्चिमी ठंडी हवाएं और आसमान में बादलों की स्थिति प्रमुख हैं। नवंबर के दौरान जब हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी बढ़ती है और उत्तर-पश्चिम से ठंडी तथा शुष्क हवाएं मैदानी इलाकों की ओर पहुंचती हैं, तो दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में तापमान गिरने लगता है।
यदि किसी पश्चिमी विक्षोभ के कारण पहाड़ी क्षेत्रों में बारिश और बर्फबारी होती है, तो उसके गुजरने के बाद मैदानी इलाकों में ठंडी हवाओं के कारण तापमान में गिरावट देखने को मिल सकती है। मुरासु का मुख्य प्रभाव दक्षिणी और मध्य भारत के हिस्सों तक सीमित रहने की संभावना जताई गई है। इसलिए इसका दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सर्दी पर कोई बड़ा प्रत्यक्ष असर अभी स्पष्ट नहीं है।
पूर्वी उत्तर प्रदेश और मध्य भारत में किसी कमजोर पड़े चक्रवात के अवशेष यदि नमी पहुंचाते हैं तो वहां कुछ समय के लिए बादल और बारिश जैसी परिस्थितियां बन सकती हैं। लेकिन ऐसा होने के लिए तूफान के वास्तविक रास्ते का अध्ययन आवश्यक है। नवंबर का शुरुआती मौसम सामान्य से गर्म रहने की संभावना के बावजूद दिसंबर और जनवरी में कितनी ठंड पड़ेगी, इसका निष्कर्ष अभी नहीं निकाला जा सकता।
लगातार दो चक्रवात आने का यह अर्थ नहीं है कि दिसंबर और जनवरी में रिकॉर्ड तोड़ ठंड पड़ेगी। इसी तरह यह भी निश्चित नहीं है कि सर्दी कमजोर रहेगी। भारत में सर्दियों की तीव्रता कई वैश्विक और क्षेत्रीय मौसम परिस्थितियों से प्रभावित होती है। इनमें प्रशांत महासागर की एल नीनो और ला नीना स्थितियां, पश्चिमी विक्षोभों की सक्रियता, हिमालय में बर्फबारी तथा वायुमंडलीय हवाओं का प्रवाह शामिल हैं।
ला नीना के दौरान कुछ वर्षों में उत्तर भारत में अधिक ठंड की परिस्थितियां देखी गई हैं, लेकिन हर ला नीना वर्ष में ऐसा होना जरूरी नहीं है। सर्दियों की वास्तविक तीव्रता का आकलन करने के लिए दिसंबर और जनवरी के मौसमी पूर्वानुमानों का इंतजार करना होगा। इस समय उपलब्ध जानकारी के अनुसार, केवल अर्नब और मुरासु के आधार पर यह दावा करना उचित नहीं होगा कि इस बार सर्दी रिकॉर्ड तोड़ेगी।
अक्टूबर और नवंबर बंगाल की खाड़ी में चक्रवातों की सक्रियता के महत्वपूर्ण महीने हैं। मानसून की वापसी के बाद समुद्री क्षेत्र में बनने वाले निम्न दबाव तंत्रों को कई बार चक्रवात में बदलने के लिए अनुकूल वातावरण मिल जाता है। ऐसी स्थिति में नवंबर के बाकी दिनों में नए निम्न दबाव क्षेत्र बनने की संभावना बनी रह सकती है।
हालांकि तीसरा चक्रवात निश्चित रूप से आएगा, इसका कोई पुष्ट पूर्वानुमान फिलहाल उपलब्ध नहीं है। किसी नए तूफान के गठन की आशंका होने पर मौसम विभाग समुद्र के तापमान, उपग्रह चित्रों, वायुमंडलीय दबाव और हवा की गति के आंकड़ों का विश्लेषण करता है। इसलिए सोशल मीडिया पर किसी तीसरे चक्रवात की निश्चित तारीख या उसके टकराने के स्थान से जुड़े दावों पर आधिकारिक पुष्टि के बिना भरोसा नहीं करना चाहिए।
किसानों और मछुआरों के लिए क्यों बढ़ी चिंता?
चक्रवातों का असर केवल तटीय शहरों तक सीमित नहीं रहता। इनके कारण ग्रामीण क्षेत्रों और कृषि गतिविधियों को भी गंभीर नुकसान हो सकता है। आंध्र प्रदेश और आसपास के राज्यों में भारी वर्षा से खेतों में पानी भरने, खड़ी फसलों के गिरने और कटाई के बाद रखी उपज खराब होने का खतरा रहता है।
विशेष रूप से धान की फसल के लिए तेज हवाएं और लगातार बारिश नुकसानदायक हो सकती हैं। बारिश के कारण फसल कटाई, परिवहन और मंडियों तक अनाज पहुंचाने का काम बाधित हो सकता है। मछुआरों के सामने भी गंभीर चुनौतियां हैं। समुद्र में तेज हवाएं और ऊंची लहरें छोटी नौकाओं के लिए खतरनाक साबित हो सकती हैं। इसलिए प्रशासन की चेतावनी समाप्त होने तक समुद्र में नहीं उतरना चाहिए। तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों को बिजली के टूटे तारों, जलभराव, कमजोर इमारतों और पेड़ों से दूर रहने की सलाह दी गई है।
क्या बदल रहा है भारत का मौसम?
अर्नब और मुरासु के बीच बेहद कम अंतराल ने भारत की चक्रवात संबंधी तैयारियों की अहमियत एक बार फिर सामने ला दी है। बंगाल की खाड़ी पहले भी शक्तिशाली तूफानों का केंद्र रही है। हालांकि समुद्र के तापमान में दीर्घकालिक वृद्धि और वायुमंडल में नमी की बढ़ती क्षमता भविष्य में कुछ चक्रवातों के दौरान भारी वर्षा और तीव्रता बढ़ने के जोखिम को प्रभावित कर सकती है।
वैज्ञानिकों के लिए यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि तूफान कितनी तेजी से शक्तिशाली हो रहे हैं और तट के निकट पहुंचने पर उनकी तीव्रता में कितना बदलाव आता है। तटीय क्षेत्रों में बढ़ती आबादी, शहरीकरण और बुनियादी ढांचे के विस्तार के कारण चक्रवातों से होने वाला संभावित आर्थिक नुकसान भी बढ़ सकता है। इन परिस्थितियों में समय रहते चेतावनी जारी करना, सुरक्षित निकासी, बिजली और संचार व्यवस्था की तैयारी तथा मजबूत तटीय बुनियादी ढांचा बेहद जरूरी हो जाता है।
बंगाल की खाड़ी में एक सप्ताह के भीतर अर्नब और मुरासु जैसे दो चक्रवातों का आना मौसम की दृष्टि से महत्वपूर्ण घटना है। इन तूफानों ने पूर्वी और दक्षिणी भारत में भारी बारिश, तेज हवाओं तथा तटीय जलभराव का खतरा बढ़ाया है। लेकिन इनका उत्तर भारत की पूरी सर्दी पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह अभी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।
नवंबर में सामान्य से अधिक तापमान रहने का मौसम विभाग का पूर्वानुमान जरूर संकेत देता है कि कई क्षेत्रों में ठंड की शुरुआत अपेक्षाकृत धीमी महसूस हो सकती है। हालांकि आने वाले सप्ताहों में पश्चिमी विक्षोभ और हिमालयी बर्फबारी से मौसम की स्थिति बदल सकती है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि अर्नब के बाद मुरासु क्यों आया, बल्कि यह भी है कि क्या भविष्य में समुद्री तूफानों की बढ़ती तीव्रता के लिए भारत को और मजबूत तैयारी करनी होगी। मौसम वैज्ञानिकों के लिए समुद्र की बदलती परिस्थितियों को समझना और तटीय क्षेत्रों के लिए समय पर चेतावनी सुनिश्चित करना पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।



