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NCP में पावर गेम! पार्थ पवार का बढ़ता दबदबा या विलय की तैयारी? दिग्गज क्यों बेचैन?

2 नवंबर 2026 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से एनसीपी के वरिष्ठ नेताओं की मुलाकात ने इन चर्चाओं को नई गति दे दी। प्रफुल्ल पटेल, छगन भुजबल, सुनील तटकरे, हसन मुश्रीफ, दिलीप वाल्से-पाटिल और धनंजय मुंडे जैसे प्रमुख नेताओं ने दिल्ली में शाह से मुलाकात की।

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NCP में पावर गेम! पार्थ पवार का बढ़ता दबदबा या विलय की तैयारी? दिग्गज क्यों बेचैन?

LIVE 24 TV | विशेष राजनीतिक रिपोर्ट | 3 नवंबर 2026

महाराष्ट्र की राजनीति में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के भीतर सत्ता और संगठन पर नियंत्रण को लेकर नई हलचल तेज हो गई है। अजित पवार के निधन के बाद पार्टी की कमान संभाल रहीं सुनेत्रा पवार और उनके बेटे पार्थ पवार की भूमिका को लेकर वरिष्ठ नेताओं के बीच मतभेद की खबरें सामने आई हैं। दूसरी ओर, शरद पवार के नेतृत्व वाले एनसीपी गुट के साथ संभावित विलय की चर्चा ने राजनीतिक समीकरणों को और जटिल बना दिया है।

2 नवंबर 2026 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से एनसीपी के वरिष्ठ नेताओं की मुलाकात ने इन चर्चाओं को नई गति दे दी। प्रफुल्ल पटेल, छगन भुजबल, सुनील तटकरे, हसन मुश्रीफ, दिलीप वाल्से-पाटिल और धनंजय मुंडे जैसे प्रमुख नेताओं ने दिल्ली में शाह से मुलाकात की। खास बात यह रही कि इस प्रतिनिधिमंडल में पार्टी अध्यक्ष सुनेत्रा पवार और राज्यसभा सांसद पार्थ पवार शामिल नहीं थे।

इस बैठक के बाद तीन सवाल महाराष्ट्र के राजनीतिक गलियारों में प्रमुखता से उठ रहे हैं। क्या पार्थ पवार का बढ़ता प्रभाव वरिष्ठ नेताओं के लिए चिंता का कारण बन रहा है? क्या भाजपा दोनों एनसीपी गुटों को एकजुट कर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को मजबूत करना चाहती है? या फिर यह पूरा विवाद संगठनात्मक नियुक्तियों, मंत्रिपदों और महत्वपूर्ण विभागों में हिस्सेदारी को लेकर है?

हालांकि एनसीपी के आधिकारिक प्रवक्ताओं ने आंतरिक कलह और विलय की खबरों को खारिज किया है। इसलिए इस पूरे घटनाक्रम में सार्वजनिक रूप से पुष्ट तथ्यों और सूत्रों के हवाले से सामने आए दावों के बीच अंतर करना जरूरी है।

अमित शाह से मुलाकात ने क्यों बढ़ाई राजनीतिक हलचल?

सोमवार, 2 नवंबर को एनसीपी के वरिष्ठ नेताओं का प्रतिनिधिमंडल दिल्ली पहुंचा और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की। राजनीतिक दृष्टि से यह बैठक इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि इसमें शामिल नेता लंबे समय से पार्टी की संगठनात्मक और राजनीतिक रणनीति तय करने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं।

2023 में जब अजित पवार ने शरद पवार से अलग होकर अपनी राजनीतिक राह चुनी थी, तब इन्हीं नेताओं में से कई ने उनका समर्थन किया था। लेकिन अब पार्टी नेतृत्व में बदलाव के बाद निर्णय लेने की प्रक्रिया और वरिष्ठ नेताओं की भूमिका को लेकर असहमति की खबरें सामने आ रही हैं।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, बैठक में महाराष्ट्र सरकार का वित्त विभाग वापस एनसीपी को सौंपने, मंत्रिमंडल में पार्टी की हिस्सेदारी बढ़ाने, संगठनात्मक नियुक्तियों और नेतृत्व की कार्यशैली जैसे मुद्दों पर बातचीत हुई। कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया कि संभावित विलय पर भी चर्चा हुई। हालांकि इस संबंध में सार्वजनिक रूप से किसी अंतिम निर्णय की पुष्टि नहीं हुई है।

एनसीपी प्रवक्ता उमेश पाटिल ने स्पष्ट किया कि अमित शाह से मुलाकात पहले से निर्धारित थी। उनके मुताबिक, सुनेत्रा पवार ने ही अपनी पिछली मुलाकात के दौरान वरिष्ठ नेताओं के प्रतिनिधिमंडल के लिए समय मांगा था। पार्टी ने इस बैठक को आंतरिक विद्रोह के तौर पर पेश किए जाने का विरोध किया है।

पार्थ पवार की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता इस विवाद का महत्वपूर्ण पहलू है। अजित पवार के निधन के बाद पार्थ को राज्यसभा भेजा गया और उनकी संगठनात्मक भूमिका भी चर्चा में आने लगी। वरिष्ठ नेताओं के एक वर्ग की शिकायत, मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यह है कि महत्वपूर्ण नियुक्तियों और राजनीतिक निर्णयों में पर्याप्त विचार-विमर्श नहीं हो रहा है।

बताया जा रहा है कि युवा, छात्र और महिला संगठनों के पदाधिकारियों की नियुक्तियों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। कुछ वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि जिन निर्णयों पर पहले संगठन के अनुभवी पदाधिकारियों से चर्चा होती थी, अब उनमें उनकी भूमिका सीमित होती दिखाई दे रही है। राजनीतिक विश्लेषण के लिहाज से यह केवल नई और पुरानी पीढ़ी के नेतृत्व का मुद्दा नहीं है। इसके पीछे पार्टी में निर्णय लेने का अधिकार, संगठन पर पकड़ और भविष्य के नेतृत्व की दिशा जैसे प्रश्न भी जुड़े हैं।

प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे की नाराजगी की वजह क्या है?

एनसीपी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल और महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष सुनील तटकरे पार्टी के प्रमुख रणनीतिकारों में गिने जाते हैं। अजित पवार के नेतृत्व में पार्टी के अलग राजनीतिक रास्ते पर आगे बढ़ने के दौरान दोनों नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। रिपोर्टों के अनुसार, हाल के कुछ संगठनात्मक फैसलों में दोनों नेताओं की भूमिका को लेकर प्रश्न उठे हैं। विशेष रूप से चुनाव आयोग को भेजे गए एक पत्र, संगठनात्मक नियुक्तियों और शीर्ष नेतृत्व के सीधे भाजपा नेताओं से संपर्क को लेकर असहमति की खबरें सामने आई हैं।

20 अक्टूबर को सुनेत्रा पवार और पार्थ पवार ने अमित शाह से मुलाकात की थी। उस मुलाकात में प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे शामिल नहीं थे। इसके बाद 2 नवंबर को वरिष्ठ नेताओं ने शाह से अलग बैठक की। इन घटनाओं को पार्टी के भीतर संवाद की अलग-अलग व्यवस्थाओं और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर पैदा हुए मतभेदों के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि पार्टी ने ऐसे किसी विभाजन से इनकार किया है।

महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेता छगन भुजबल भी इस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उनका लंबा राजनीतिक अनुभव और संगठन में प्रभाव उन्हें एनसीपी के प्रमुख नेताओं में शामिल करता है। भुजबल की राजनीतिक प्राथमिकताओं में संगठन के भीतर वरिष्ठ नेताओं की भागीदारी के साथ-साथ सरकार में पार्टी का प्रतिनिधित्व भी शामिल है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, एनसीपी के हिस्से का एक मंत्रिपद खाली है। इस पद के लिए दिलीप वाल्से-पाटिल, धनंजय मुंडे और समीर भुजबल जैसे नेताओं के नाम चर्चा में हैं। खबरों में यह भी कहा गया है कि छगन भुजबल समीर भुजबल को मंत्रिमंडल में स्थान दिलाने के इच्छुक हैं। इसी बीच मुंबई एनसीपी अध्यक्ष के रूप में जीशान सिद्दीकी और पार्टी के मुख्य प्रवक्ता के रूप में उमेश पाटिल की नियुक्ति को लेकर भी वरिष्ठ नेताओं की कथित आपत्तियां सामने आई हैं।

ऐसे में भुजबल और दूसरे नेताओं की चिंताओं को केवल पार्थ पवार के व्यक्तिगत प्रभाव से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं होगा। संगठनात्मक प्रतिनिधित्व, मंत्रिमंडल में स्थान और राजनीतिक निर्णयों में भागीदारी भी इस विवाद के महत्वपूर्ण पहलू हैं।

शरद पवार की वापसी का रास्ता या नई राजनीतिक उलझन?

एनसीपी के भीतर जारी गतिविधियों के बीच सबसे महत्वपूर्ण चर्चा शरद पवार और सुनेत्रा पवार के नेतृत्व वाले दोनों गुटों के संभावित विलय की है। वर्ष 2023 में एनसीपी में विभाजन हुआ था। अजित पवार के नेतृत्व वाला गुट भाजपा और शिवसेना के साथ महाराष्ट्र की सत्ता में शामिल हुआ, जबकि शरद पवार का गुट विपक्षी राजनीति का हिस्सा बना रहा।

अजित पवार के निधन के बाद दोनों गुटों के भविष्य को लेकर नए राजनीतिक सवाल सामने आए हैं। 2 नवंबर की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से दावा किया गया कि भाजपा दोनों गुटों को एकजुट करके उन्हें एनडीए के भीतर लाने की संभावनाएं तलाश रही है। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि विलय की स्थिति में दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल में दो पद देने का प्रस्ताव चर्चा में रहा है। हालांकि इस कथित प्रस्ताव की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

यहां महत्वपूर्ण सवाल है कि यदि विलय होता है तो नई पार्टी की कमान किसके हाथ में होगी? शरद पवार, सुनेत्रा पवार, पार्थ पवार और अन्य वरिष्ठ नेताओं की भूमिका कैसे निर्धारित होगी? ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि दोनों गुटों की वर्तमान गठबंधन राजनीति अलग-अलग है।

लेकिन 3 नवंबर 2026 तक दोनों गुटों के विलय की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। सुनेत्रा पवार के नेतृत्व वाले गुट ने हाल की बैठकों के बाद विलय की संभावना को खारिज किया है। शरद पवार गुट की ओर से भी एनडीए में शामिल होने का कोई निर्णय घोषित नहीं किया गया है।

दोनों गुटों के संभावित एकीकरण की चर्चा का संबंध महाराष्ट्र से आगे राष्ट्रीय राजनीति से भी जोड़ा जा रहा है। एनसीपी का शरद पवार गुट विपक्षी इंडिया गठबंधन से जुड़ा है, जबकि सुनेत्रा पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन का हिस्सा है। यदि दोनों गुटों के बीच कभी राजनीतिक समझौता होता है, तो उसके प्रभाव महाराष्ट्र की सरकार, संसदीय सहयोग और विपक्षी गठबंधन की संरचना पर पड़ सकते हैं।

कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि भाजपा नेतृत्व एनडीए का विस्तार करने के उद्देश्य से दोनों गुटों को साथ लाने की संभावनाएं देख रहा है। हालांकि किसी भी संभावित समझौते में नेतृत्व, संगठनात्मक अधिकार, गठबंधन की सदस्यता और सरकार में हिस्सेदारी जैसे विषयों पर सहमति आवश्यक होगी। विशेष रूप से शरद पवार और उनके सहयोगियों की राजनीतिक भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी, क्योंकि उनका गुट वर्तमान में विपक्षी राजनीति में सक्रिय है। फिलहाल इन चर्चाओं को संभावित राजनीतिक विकल्प के तौर पर ही देखा जा सकता है, किसी तय समझौते के रूप में नहीं।

महाराष्ट्र का वित्त विभाग क्यों बना एनसीपी की बड़ी मांग?

विलय और संगठनात्मक विवाद से अलग एक महत्वपूर्ण मुद्दा महाराष्ट्र सरकार का वित्त विभाग भी है। अजित पवार के पास पहले महाराष्ट्र सरकार में वित्त विभाग की जिम्मेदारी थी। उनके निधन के बाद एनसीपी इस विभाग को दोबारा अपने हिस्से में लेने की मांग कर रही है।

राज्य की राजनीति में वित्त विभाग का विशेष महत्व है। बजट निर्माण, सरकारी खर्च, योजनाओं के लिए संसाधन आवंटन और वित्तीय प्राथमिकताओं के निर्धारण में इसकी केंद्रीय भूमिका होती है। एनसीपी नेताओं का मानना है कि पार्टी की सरकार में प्रभावी भागीदारी के लिए महत्वपूर्ण विभागों का प्रतिनिधित्व आवश्यक है।

2 नवंबर की अमित शाह से मुलाकात में भी वित्त विभाग का प्रश्न उठाया गया। अगले दिन प्रदेश अध्यक्ष सुनील तटकरे ने सार्वजनिक रूप से पुष्टि की कि बैठक में इस विषय पर चर्चा हुई थी। इसके अतिरिक्त मंत्रिमंडल विस्तार और एनसीपी कोटे के खाली पद को भरने पर भी ध्यान केंद्रित है। ऐसे में पार्टी के भीतर जारी राजनीतिक गतिविधियां केवल नेतृत्व के विवाद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सत्ता में जिम्मेदारियों के बंटवारे से भी जुड़ी हुई हैं।

एनसीपी के भीतर संगठन की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों को हाल के महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव के नतीजों से भी जोड़ा जा रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, पार्टी को औरंगाबाद स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में हार का सामना करना पड़ा, जहां उसका लंबे समय से प्रभाव रहा था। इस परिणाम के बाद संगठन की चुनावी तैयारी, स्थानीय नेताओं के बीच समन्वय और नियुक्तियों की प्रक्रिया को लेकर चर्चा तेज हुई।

किसी भी राजनीतिक दल के लिए चुनावी हार के बाद संगठनात्मक समीक्षा स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन जब नेतृत्व परिवर्तन और आंतरिक मतभेद की खबरें पहले से चल रही हों, तब ऐसे परिणाम बहस को और व्यापक बना सकते हैं। एनसीपी के मामले में भी यही स्थिति दिखाई दे रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के सामने अब चुनावी संगठन को मजबूत करने और नेतृत्व में समन्वय बनाए रखने की दोहरी चुनौती है।

अमित शाह ने एनसीपी नेताओं को क्या संदेश दिया?

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अमित शाह ने मुलाकात के दौरान एनसीपी नेताओं को संगठन मजबूत करने और आंतरिक समस्याओं का समाधान करने की सलाह दी। कुछ रिपोर्टों में सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि शाह ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से स्पष्ट किया कि संगठनात्मक मतभेदों का प्रभाव महायुति सरकार के कामकाज पर भी पड़ सकता है।

हालांकि इस संबंध में अमित शाह का कोई विस्तृत आधिकारिक बयान उपलब्ध नहीं है। मुलाकात के बाद 2 नवंबर की रात मुंबई में एनसीपी की कोर समिति की बैठक हुई। प्रदेश अध्यक्ष सुनील तटकरे ने कहा कि पार्टी में असंतोष की कोई स्थिति नहीं है और सभी नेता बातचीत एवं सामूहिक नेतृत्व के माध्यम से काम कर रहे हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि बैठक में संगठन की मजबूती, महाराष्ट्र में सूखे की स्थिति और विधायकों की जिम्मेदारियों पर चर्चा हुई। इस तरह सार्वजनिक रूप से पार्टी एकजुटता का संदेश दे रही है, जबकि मीडिया रिपोर्टों में नेतृत्व संबंधी मतभेदों की चर्चा जारी है।

अब सुनेत्रा पवार और पार्थ पवार के सामने क्या चुनौती है?

सुनेत्रा पवार फरवरी 2026 में एनसीपी की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनी थीं। उनके सामने पार्टी के मौजूदा संगठनात्मक ढांचे को सक्रिय रखने, वरिष्ठ नेताओं के साथ समन्वय बनाने और महायुति सरकार में पार्टी की भूमिका को स्पष्ट करने जैसे महत्वपूर्ण विषय हैं। पार्थ पवार की बढ़ती राजनीतिक भूमिका के बीच यह भी महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी में अनुभवी नेताओं और नई पीढ़ी के नेतृत्व के बीच जिम्मेदारियां कैसे बांटी जाती हैं।

यदि भविष्य में दोनों एनसीपी गुटों के विलय पर औपचारिक बातचीत शुरू होती है, तो नेतृत्व की संरचना और भी महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकती है। वहीं, अगर दोनों गुट अलग-अलग रहने का निर्णय जारी रखते हैं, तब भी सुनेत्रा पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी को संगठनात्मक नियुक्तियों और मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी से जुड़े प्रश्नों का समाधान करना होगा।

आगे महाराष्ट्र की राजनीति में क्या देखने को मिलेगा?

आने वाले दिनों में एनसीपी की आंतरिक राजनीति के तीन प्रमुख पहलुओं पर ध्यान रहेगा, संगठनात्मक फैसलों पर वरिष्ठ नेताओं की सहमति, महाराष्ट्र सरकार में वित्त विभाग और मंत्रिपदों को लेकर बातचीत तथा दोनों गुटों के संबंधों पर आधिकारिक रुख।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि एनसीपी में नेतृत्व की नई व्यवस्था किस रूप में विकसित होगी। क्या पार्टी में सामूहिक निर्णय लेने की प्रक्रिया को और मजबूत किया जाएगा, या फिर शीर्ष नेतृत्व की भूमिका को लेकर मतभेद की खबरें जारी रहेंगी? दूसरी ओर, शरद पवार के नेतृत्व वाला गुट भी इस चर्चा का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है। संभावित विलय पर उसकी आधिकारिक स्थिति निर्णायक होगी।

फिलहाल एक बात स्पष्ट है कि 2 नवंबर की दिल्ली बैठक के बाद एनसीपी के भीतर नेतृत्व, संगठन और सरकार में हिस्सेदारी से जुड़े मुद्दे फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। हालांकि पार्टी ने किसी आंतरिक विभाजन या विलय योजना की पुष्टि नहीं की है। महाराष्ट्र में एनसीपी की अगली राजनीतिक दिशा का निर्धारण सार्वजनिक घोषणाओं, संगठनात्मक फैसलों और गठबंधन सहयोगियों के बीच होने वाली औपचारिक सहमति से ही होगा।

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