
जंतर-मंतर प्रदर्शन विवाद: 'कॉकरोच जनता पार्टी' के दो नेता तिहाड़ जेल भेजे गए
फिलहाल, सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत, दिल्ली पुलिस की कार्रवाई और जंतर-मंतर के बदले हुए दर्जे ने विरोध प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकारों पर नई बहस शुरू कर दी है।

विशेष समाचार | LIVE 24 TV
नई दिल्ली | 14 अक्टूबर 2026 | लाइव 24 टीवी विशेष रिपोर्ट
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन और 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) के दो प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी ने राजनीतिक विवाद को जन्म दिया है। संगठन के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका को पाँच दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया गया है। दिल्ली पुलिस का आरोप है कि दोनों नेताओं ने प्रतिबंधित प्रदर्शन क्षेत्र में बिना अनुमति प्रवेश किया और पहले से निर्धारित शांति बनाए रखने की शर्तों का उल्लंघन किया। वहीं, संगठन और विपक्षी नेताओं ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं।
कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?
यह विवाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध चल रहे विरोध प्रदर्शनों से जुड़ा है। कॉकरोच जनता पार्टी, छात्र संगठनों और विपक्षी दलों ने मतदाता सूचियों में संशोधन तथा कथित चुनावी अनियमितताओं को लेकर आपत्तियाँ जताई हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि मतदाता सूचियों से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के कारण नागरिकों के मतदान अधिकार प्रभावित हुए हैं। हालाँकि, निर्वाचन आयोग ने राजनीतिक पक्षपात के आरोपों को खारिज किया है। भारतीय जनता पार्टी ने भी विपक्ष के आरोपों का विरोध करते हुए चुनावी प्रक्रियाओं पर उठाए जा रहे सवालों को अनुचित बताया है।
13 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर क्या हुआ?
दिल्ली पुलिस के अनुसार, 13 अक्टूबर की सुबह सौरव दास, आशुतोष रांका, अजिंक्य शिंदे और उनके ग्यारह अन्य सहयोगी जंतर-मंतर पहुँचे।
पुलिस का दावा है कि प्रदर्शनकारियों ने जनता दल यूनाइटेड के कार्यालय के पीछे स्थित संकरे रास्ते का उपयोग किया और बंद लोहे के द्वार को पार करके प्रदर्शन स्थल में प्रवेश किया।
इसके बाद कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया और मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध नारेबाजी की।
पुलिस के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों को रोकने का प्रयास किया गया, लेकिन कुछ लोगों ने कथित रूप से पुलिसकर्मियों के कार्य में बाधा पहुँचाई। इसके बाद चौदह लोगों को हिरासत में लिया गया।
दो थानों में प्राथमिकी, तीन नेताओं पर कार्रवाई
दिल्ली पुलिस ने इस मामले में कनॉट प्लेस और संसद मार्ग थानों में दो अलग-अलग प्राथमिकियाँ दर्ज की हैं।
इनमें सरकारी आदेश की अवहेलना, अनधिकृत प्रवेश, आपराधिक षड्यंत्र और सरकारी कार्य में बाधा पहुँचाने से संबंधित आरोप शामिल हैं।
पुलिस ने यह भी दावा किया कि कुछ प्रदर्शनकारी सामाजिक माध्यमों के जरिए अन्य लोगों को ऐसी गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रेरित कर रहे थे।
सौरव दास, आशुतोष रांका और अजिंक्य शिंदे के विरुद्ध सार्वजनिक शांति बनाए रखने संबंधी निवारक कानूनी प्रावधानों के अंतर्गत कार्रवाई की गई। आरोपों की न्यायिक जाँच और अंतिम कानूनी निष्कर्ष अभी अलग विषय हैं।
पाँच दिन की न्यायिक हिरासत का आदेश
14 अक्टूबर को तीनों नेताओं को मंदिर मार्ग स्थित विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया गया।सुनवाई के बाद सौरव दास और आशुतोष रांका को पाँच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया गया।
पुलिस के अनुसार, दोनों ने दस अक्टूबर को हिरासत से रिहा होते समय शांति बनाए रखने संबंधी मुचलका भरा था। पुलिस का आरोप है कि जंतर-मंतर में प्रवेश करके उन्होंने उस शर्त का उल्लंघन किया। तीसरे नेता अजिंक्य शिंदे को मुचलके और जमानत की औपचारिकताएँ पूरी करने के बाद रिहा कर दिया गया।यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि पाँच दिन की न्यायिक हिरासत दोषसिद्धि या पाँच दिन के कारावास की अंतिम सजा नहीं है।
संगठन ने पुलिस कार्रवाई का किया विरोध
सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने गिरफ्तारी की निंदा करते हुए सवाल उठाया कि अपने देश में राष्ट्रीय ध्वज फहराना शांति भंग करने का आधार कैसे हो सकता है। उन्होंने सरकार पर असहमति की आवाज दबाने का आरोप लगाया और कहा कि संगठन ऐसी कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगा। संगठन के नेताओं का कहना है कि उनका उद्देश्य शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराना तथा लोकतांत्रिक अधिकारों के संरक्षण की माँग करना था। वहीं, पुलिस का पक्ष है कि मामला केवल राष्ट्रीय ध्वज फहराने का नहीं, बल्कि बिना अनुमति प्रवेश और पूर्व कानूनी शर्तों के कथित उल्लंघन का है।
राहुल गांधी और आम आदमी पार्टी की प्रतिक्रिया
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने दोनों नेताओं को न्यायिक हिरासत में भेजे जाने की आलोचना की। उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान तिरंगा फहराना अपराध नहीं होना चाहिए। राहुल गांधी ने छात्र संगठनों, युवाओं, पत्रकारों और विपक्षी गठबंधन के आंदोलनों को संवैधानिक अधिकारों से जुड़ी व्यापक माँग का हिस्सा बताया।
उन्होंने जंतर-मंतर को जनता का स्थल बताते हुए वहाँ प्रदर्शन के अधिकार को पुनः स्थापित करने की बात कही। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी गिरफ्तारी पर आपत्ति जताई और अपने ही देश में राष्ट्रीय ध्वज फहराने को अपराध मानने के विचार पर सवाल उठाया।
बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने भी उठाए सवाल
गिरफ्तार नेताओं की ओर से उपस्थित अधिवक्ता अभिष्ट हेला ने पुलिस द्वारा प्रस्तुत तथ्यों का विरोध किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि न्यायालय के समक्ष यह गलत दावा किया गया कि नेताओं ने अन्य लोगों को जंतर-मंतर पहुँचने के लिए उकसाया था। अधिवक्ता ने मुचलके के उल्लंघन संबंधी पुलिस के तर्क पर भी असहमति व्यक्त की। इस प्रकार मामले में पुलिस और बचाव पक्ष के दावों के बीच स्पष्ट मतभेद सामने आए हैं।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति क्यों समाप्त हुई?
दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को अधिकृत प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया है। इसके स्थान पर रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली स्थित केंद्रीय व्यापारिक जिला मैदान जैसे स्थानों को विरोध प्रदर्शनों के लिए निर्धारित किया गया है। इस निर्णय पर भी राजनीतिक और नागरिक स्तर पर विवाद जारी है।
आलोचकों का तर्क है कि राजधानी के प्रमुख सार्वजनिक स्थलों पर विरोध प्रदर्शन की सुविधा सीमित होने से नागरिकों की आवाज प्रभावी ढंग से सामने रखने में कठिनाई हो सकती है।
संविधान और नागरिक अधिकारों से जुड़ा प्रश्न
भारतीय संविधान का अनुच्छेद १९ नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा शांतिपूर्ण और निरस्त्र सभा आयोजित करने का अधिकार प्रदान करता है। हालाँकि, इन अधिकारों पर कानून के अनुसार उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। ऐसे में इस विवाद का मुख्य प्रश्न यह है कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए लगाए गए प्रतिबंध और नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार के बीच उचित संतुलन कैसे सुनिश्चित किया जाए। फिलहाल, सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत, दिल्ली पुलिस की कार्रवाई और जंतर-मंतर के बदले हुए दर्जे ने विरोध प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकारों पर नई बहस शुरू कर दी है।
आगे की कानूनी कार्यवाही और संबंधित अधिकारियों के निर्णय से यह स्पष्ट होगा कि मामले में उठाई गई आपत्तियों तथा पुलिस के आरोपों का निस्तारण किस प्रकार होता है।
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