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किरेन रिजिजू का बड़ा हमला: ‘भारत में बांग्लादेश-फ्रांस जैसी हिंसा फैलाने की रची गई थी साजिश’, सत्ता परिवर्तन के नाम पर अराजकता फैलाने वालों पर गंभीर सवाल

भारत की लोकतांत्रिक शक्ति उसकी जनता, संविधान और संवैधानिक संस्थाओं में निहित है। किसी भी प्रमाणित हिंसक षड्यंत्र को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए, चाहे उसके पीछे कोई भी व्यक्ति या संगठन क्यों न हो।

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किरेन रिजिजू का बड़ा हमला: ‘भारत में बांग्लादेश-फ्रांस जैसी हिंसा फैलाने की रची गई थी साजिश’, सत्ता परिवर्तन के नाम पर अराजकता फैलाने वालों पर गंभीर सवाल

LIVE 24 TV | विशेष रिपोर्ट | नई दिल्ली | 18 अक्टूबर 2026

नई दिल्ली। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था, संवैधानिक संस्थाओं और देश की आंतरिक स्थिरता को लेकर एक बार फिर गंभीर राजनीतिक बहस छिड़ गई है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष के कुछ नेताओं और कथित भारत-विरोधी समूहों पर ऐसा आरोप लगाया है, जिसने देश की राजनीति में हलचल तेज कर दी है। रिजिजू का दावा है कि भारत में बांग्लादेश और फ्रांस जैसी हिंसक परिस्थितियां पैदा करने, युवाओं को भड़काने और सड़कों पर अराजकता फैलाने की साजिश रची गई थी।

18 अक्टूबर को सोशल मीडिया मंच एक्स पर जारी बयान में रिजिजू ने स्पष्ट किया कि भारत में सत्ता परिवर्तन संभव है, लेकिन उसका रास्ता केवल लोकतांत्रिक चुनाव हैं। उनके इस बयान ने एक गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या लोकतांत्रिक विरोध की आड़ में कुछ तत्व देश की स्थिरता को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं? हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र जांच से पुष्टि फिलहाल सामने नहीं आई है।

भारत न तो बांग्लादेश है और न ही फ्रांस: रिजिजू

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने अपने बयान में बांग्लादेश की हिंसक घटनाओं और फ्रांस में हुई आगजनी, दंगों तथा लूटपाट का उल्लेख किया।

उन्होंने आरोप लगाया कि भारत में भी कुछ राजनीतिक व्यक्तियों और कथित भारत-विरोधी समूहों ने मिलकर युवाओं को उकसाने तथा हिंसक माहौल तैयार करने की योजना बनाई थी।

रिजिजू ने स्पष्ट संदेश दिया कि भारत न तो बांग्लादेश है और न ही फ्रांस। उन्होंने सत्ता परिवर्तन को लेकर कहा कि भारत में सरकार चुनावों के माध्यम से बदली जा सकती है, जॉर्ज सोरोस के माध्यम से नहीं।

उनका यह बयान उन लोगों पर सीधा राजनीतिक प्रहार माना जा रहा है, जिन पर भाजपा लोकतांत्रिक आंदोलनों की आड़ में अस्थिरता पैदा करने का आरोप लगा रही है।

सवाल यह है कि अगर किसी आंदोलन का घोषित उद्देश्य लोकतंत्र की रक्षा है, तो उसके भीतर हिंसा या असंवैधानिक सत्ता परिवर्तन की सोच के लिए कोई स्थान कैसे हो सकता है?

प्रशांत भूषण और नेहा बोरा के बयानों से बढ़ा विवाद

इस राजनीतिक विवाद के केंद्र में वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की अध्यक्ष नेहा बोरा के सत्ता परिवर्तन संबंधी बयान भी हैं।

रिजिजू ने दोनों के बयानों से संबंधित वीडियो साझा करते हुए विपक्ष की मंशा पर सवाल उठाए।

प्रशांत भूषण ने सार्वजनिक रूप से सत्ता परिवर्तन की इच्छा व्यक्त की थी। भाजपा ने उनके बयान को आधार बनाकर आरोप लगाया कि कुछ आंदोलनकारी संगठनों का उद्देश्य केवल चुनावी सुधार नहीं, बल्कि मौजूदा सरकार को हटाने के लिए व्यापक जनदबाव तैयार करना है।

हालांकि, भूषण ने अपने पक्ष में लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता परिवर्तन की बात कही है।

यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल किसी सरकार को बदलने की इच्छा नहीं, बल्कि परिवर्तन के लिए अपनाए जाने वाले तरीकों का है। चुनाव के जरिए सरकार बदलने की मांग संवैधानिक अधिकार है, लेकिन हिंसा, आगजनी अथवा आपराधिक षड्यंत्र के माध्यम से सरकार को अस्थिर करने का प्रयास कानून के दायरे में आएगा।

राजनाथ सिंह ने भी विपक्ष की मंशा पर उठाए सवाल

इस मामले में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी विपक्ष पर तीखा प्रहार कर चुके हैं।

16 अक्टूबर को लखनऊ में राजनाथ सिंह ने आरोप लगाया कि कांग्रेस और उसके सहयोगी बांग्लादेश की राजनीतिक घटनाओं से प्रेरित होकर भारत में सत्ता परिवर्तन का वातावरण तैयार करना चाहते हैं।

उन्होंने विपक्ष पर युवाओं को राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करने तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करने का आरोप लगाया।

भाजपा के अन्य वरिष्ठ नेताओं ने भी आंदोलन के दौरान सामने आए बयानों को लेकर विपक्ष से जवाब मांगा है।

इस प्रकार विवाद अब केवल एक केंद्रीय मंत्री के बयान तक सीमित नहीं रहा। भाजपा नेतृत्व इसे देश की राजनीतिक स्थिरता और संवैधानिक व्यवस्था से जुड़े व्यापक मुद्दे के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।

एसआईआर विवाद: चुनावी सुधार या राजनीतिक टकराव?

इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर जारी विरोध प्रदर्शन हैं।

विपक्षी दलों और छात्र संगठनों ने एसआईआर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर भी प्रदर्शन हुए हैं।

आंदोलनकारियों का कहना है कि वे मतदाताओं के अधिकारों, चुनावी पारदर्शिता और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही के लिए आवाज उठा रहे हैं।

दूसरी ओर, भाजपा का आरोप है कि कुछ लोग इन मांगों के माध्यम से राजनीतिक अस्थिरता पैदा करना चाहते हैं।

लोकतंत्र में चुनाव आयोग से सवाल पूछना गलत नहीं है। लेकिन बिना साक्ष्य गंभीर आरोप लगाना, हिंसा को बढ़ावा देना या नागरिकों में भय फैलाना किसी भी आंदोलन की विश्वसनीयता कमजोर करता है।

इसीलिए विरोध प्रदर्शनों से जुड़े संगठनों की जिम्मेदारी है कि वे अपनी मांगें स्पष्ट रखें और हिंसा से पूरी तरह दूरी बनाए रखें।

विदेशी हस्तक्षेप का आरोप, सोरोस का नाम क्यों?

रिजिजू के बयान में अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस का उल्लेख भी महत्वपूर्ण है।

भाजपा के कई नेता पहले भी सोरोस और विदेशी प्रभाव से संबंधित आशंकाएं व्यक्त कर चुके हैं।

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में विदेशी हस्तक्षेप का कोई भी प्रमाणित प्रयास गंभीर विषय होगा। ऐसी स्थिति में उसकी निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध कानूनसम्मत कार्रवाई आवश्यक है।

लेकिन इस प्रकरण में सोरोस अथवा किसी विदेशी संगठन की हिंसक साजिश में प्रत्यक्ष भागीदारी का स्वतंत्र रूप से सत्यापित प्रमाण सार्वजनिक रिपोर्टों में उपलब्ध नहीं है।

इसलिए आरोपों की गंभीरता के अनुरूप सबूत भी सामने आने चाहिए।

राष्ट्रहित के नाम पर सबसे बड़ी कसौटी: संविधान और कानून

देशहित को सर्वोपरि मानने वाले प्रत्येक नागरिक के लिए यह समझना जरूरी है कि राष्ट्र की स्थिरता और लोकतांत्रिक अधिकार एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।

भारत का संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। लेकिन ये अधिकार हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने या कानून-व्यवस्था ध्वस्त करने की छूट नहीं देते।

जो व्यक्ति या संगठन जानबूझकर हिंसा भड़काते हैं, उन्हें राजनीतिक पहचान से परे कानून के सामने जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।

साथ ही, किसी व्यक्ति को केवल सरकार की आलोचना करने या सत्ता परिवर्तन की लोकतांत्रिक मांग उठाने के कारण राष्ट्रविरोधी घोषित करना भी न्यायसंगत नहीं होगा।

राष्ट्रहित की रक्षा का अर्थ है—हिंसा के प्रति कठोरता, गंभीर आरोपों पर प्रमाण की मांग और संविधान के प्रति अटूट प्रतिबद्धता।

देश को जवाब चाहिए, केवल राजनीतिक आरोप नहीं

किरन रिजिजू ने जो आरोप लगाए हैं, वे बेहद गंभीर हैं और उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती।

यदि भारत में युवाओं को भड़काकर हिंसा फैलाने की कोई सुनियोजित साजिश रची गई थी, तो देश के सामने उसके प्रमाण आने चाहिए। संबंधित व्यक्तियों, संगठनों और कथित वित्तीय नेटवर्क की कानून के अनुसार जांच होनी चाहिए।लेकिन आरोप और अपराध सिद्ध होना अलग-अलग बातें हैं। अब आवश्यक है कि राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर तथ्य सामने आएं।

भारत की लोकतांत्रिक शक्ति उसकी जनता, संविधान और संवैधानिक संस्थाओं में निहित है। किसी भी प्रमाणित हिंसक षड्यंत्र को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए, चाहे उसके पीछे कोई भी व्यक्ति या संगठन क्यों न हो।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या कथित साजिश के ठोस प्रमाण सार्वजनिक होंगे और जिम्मेदार लोगों की पहचान होगी?

देश को इस सवाल का जवाब चाहिए, क्योंकि राष्ट्र की सुरक्षा राजनीति का हथियार नहीं, बल्कि सभी की साझा जिम्मेदारी है।


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