
UPI MDR चार्जेस अपडेट: 2,000 रुपये से ज्यादा के यूपीआई भुगतान पर शुल्क का फैसला टला, NPCI ने दिवाली तक दी राहत
एनपीसीआई ने चुनिंदा बड़े यूपीआई व्यापारी भुगतानों पर प्रस्तावित 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट को 15 अक्टूबर से लागू करने के बजाय दिवाली के बाद तक स्थगित कर दिया है। आम ग्राहकों से कोई प्रत्यक्ष शुल्क नहीं लिया जाएगा, लेकिन व्यापारियों पर इसके संभावित असर को लेकर बहस जारी है।

नई दिल्ली, 14 अक्टूबर 2026 | LIVE 24 TV विशेष रिपोर्ट
भारत में डिजिटल भुगतान करने वाले करोड़ों लोगों और व्यापारियों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा यूपीआई व्यापारी लेनदेन पर प्रस्तावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने का फैसला फिलहाल टाल दिया है।
यह नई शुल्क व्यवस्था 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाली थी, लेकिन त्योहारी खरीदारी, व्यापारिक संगठनों की चिंताओं और भुगतान कंपनियों की तकनीकी तैयारियों को ध्यान में रखते हुए इसकी समयसीमा बढ़ा दी गई है।
13 अक्टूबर को यूपीआई एंड सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी की बैठक के बाद NPCI ने स्पष्ट किया कि नया MDR ढांचा अब दिवाली के बाद लागू किया जाएगा। इसकी अंतिम तारीख अलग से घोषित होगी। महत्वपूर्ण बात यह है कि शुल्क व्यवस्था को रद्द नहीं किया गया है, बल्कि उसके क्रियान्वयन को स्थगित किया गया है।
MDR क्या है और इसे लागू करने की जरूरत क्यों पड़ी?
मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR एक ऐसा शुल्क है, जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने वाले व्यापारी से वसूला जाता है। इसका उपयोग भुगतान प्रक्रिया से जुड़े बैंकों, फिनटेक कंपनियों और तकनीकी सेवा प्रदाताओं की लागत पूरी करने में होता है। वर्ष 2020 से सामान्य बैंक खाते से होने वाले यूपीआई व्यापारी भुगतानों पर शून्य MDR व्यवस्था लागू रही है। इसका उद्देश्य छोटे दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों और आम नागरिकों को डिजिटल भुगतान अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना था।
अब यूपीआई के लगातार बढ़ते इस्तेमाल के कारण भुगतान नेटवर्क के संचालन, साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकने और तकनीकी ढांचे के विस्तार पर खर्च बढ़ने का तर्क दिया जा रहा है। सरकार के अनुसार, प्रस्तावित MDR कोई सरकारी कर नहीं है। इससे प्राप्त राशि भुगतान व्यवस्था से जुड़े संस्थानों के बीच वितरित की जाएगी।
उदाहरण के लिए, किसी पात्र व्यापारी को ₹5,000 का भुगतान मिलने पर 0.4 प्रतिशत के हिसाब से ₹20 MDR बनेगा। इसी तरह ₹10,000 पर ₹40, ₹25,000 पर ₹100 और ₹50,000 पर ₹200 शुल्क होगा। निर्धारित सीमा के बाद अधिकतम शुल्क ₹300 रहेगा।
छोटे दुकानदारों और आम नागरिकों को कितनी राहत?
सरकार के 15 सितंबर 2026 के आधिकारिक स्पष्टीकरण के अनुसार, व्यक्ति से व्यक्ति यूपीआई के जरिए पैसा भेजना और प्राप्त करना मुफ्त रहेगा, चाहे राशि कितनी भी हो। वहीं ₹2,000 तक के व्यापारी भुगतान पर कोई MDR नहीं लगेगा। विशेष P2PM श्रेणी में आने वाले छोटे व्यापारी, जो यूपीआई क्यूआर कोड के माध्यम से प्रति माह ₹1 लाख तक भुगतान प्राप्त करते हैं, उन्हें भी शून्य MDR का लाभ मिलता रहेगा।
सरकार का दावा है कि इस व्यवस्था से लगभग 96 प्रतिशत व्यापारी यूपीआई लेनदेन प्रभावित नहीं होंगे। यानी अधिकांश छोटी खरीदारी, स्थानीय दुकानों और दैनिक जरूरतों से संबंधित भुगतान नई शुल्क व्यवस्था से बाहर रहेंगे।
MDR पर विरोध क्यों? व्यापारियों की क्या चिंताएं हैं?
प्रस्तावित MDR व्यवस्था के विरोध में सबसे प्रमुख चिंता व्यापारियों की लागत बढ़ने की है। कम लाभ पर कारोबार करने वाले दुकानदारों का तर्क है कि डिजिटल भुगतान पर अतिरिक्त शुल्क लगने से उनकी कमाई प्रभावित हो सकती है। यदि किसी उत्पाद पर व्यापारी को सीमित मुनाफा मिलता है, तो MDR उसके लाभ का एक हिस्सा कम कर देगा।
दूसरी बड़ी चिंता यह है कि व्यापारी इस खर्च की भरपाई के लिए उत्पादों की कीमत बढ़ा सकते हैं। ऐसी स्थिति में ग्राहक पर अप्रत्यक्ष आर्थिक बोझ पड़ने की आशंका है, भले ही उससे अलग से यूपीआई शुल्क न लिया जाए। व्यापारिक संगठनों ने ₹2,000 की सीमा पर भी पुनर्विचार की मांग उठाई है। उनका कहना है कि कारोबार के आकार और लाभ की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग दरें निर्धारित की जानी चाहिए।
इंडिया एसएमई फोरम के एक सर्वेक्षण में भी यह चिंता सामने आई कि बिना संशोधन MDR लागू होने पर कुछ छोटे व्यवसाय कीमतें बढ़ाने या नकद भुगतान को प्राथमिकता देने पर विचार कर सकते हैं।
डिजिटल इंडिया की रफ्तार पर असर?
यूपीआई शुल्क का मुद्दा आर्थिक होने के साथ राजनीतिक बहस का भी विषय बन गया है।आलोचकों का तर्क है कि भारत में यूपीआई की सफलता का एक प्रमुख कारण इसका सरल और कम लागत वाला भुगतान मॉडल रहा है। यदि व्यापारियों की लागत बढ़ती है, तो कुछ कारोबारी डिजिटल भुगतान के बजाय नकद लेनदेन को प्राथमिकता दे सकते हैं।
यह आशंका भी जताई जा रही है कि व्यापारियों द्वारा कीमतों में वृद्धि किए जाने से शुल्क का अप्रत्यक्ष प्रभाव उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है। हालांकि, इन चिंताओं को ग्राहकों पर प्रत्यक्ष यूपीआई शुल्क लागू होने के बराबर नहीं माना जा सकता। सरकार का आधिकारिक रुख स्पष्ट है कि सामान्य उपभोक्ताओं से यूपीआई भुगतान के लिए कोई अलग लेनदेन शुल्क नहीं लिया जाएगा।
CAIT सहित व्यापारिक संगठनों ने फैसले का किया स्वागत
कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) सहित विभिन्न व्यापारिक संगठनों ने MDR लागू करने की समयसीमा बढ़ाए जाने का स्वागत किया है। व्यापारियों के लिए दिवाली का समय साल के सबसे महत्वपूर्ण कारोबारी अवसरों में शामिल होता है। इस दौरान इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़े, आभूषण, घरेलू सामान और अन्य उत्पादों की बिक्री बढ़ती है।
ऐसे समय पर नया शुल्क लागू होने से कारोबारियों की लागत और भुगतान प्रणालियों में बदलाव संबंधी परेशानियां बढ़ सकती थीं। व्यापारिक संगठनों का मानना है कि स्थगन से नई व्यवस्था की तैयारी और संबंधित पक्षों से चर्चा के लिए अतिरिक्त समय मिलेगा।
डिजिटल भुगतान की सुविधा और लागत के बीच संतुलन की चुनौती
भारत में यूपीआई ने छोटे दुकानदार से लेकर बड़े कारोबारी प्रतिष्ठानों तक भुगतान की प्रक्रिया को आसान बनाया है। अब चुनौती इस व्यवस्था को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाए रखने के साथ-साथ इसकी लोकप्रियता और उपयोगकर्ताओं का भरोसा कायम रखने की है।
NPCI का ताजा फैसला त्योहारी सीजन में व्यापारियों को तत्काल राहत देता है, लेकिन MDR को लेकर असली परीक्षा दिवाली के बाद होगी। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नई व्यवस्था लागू करते समय डिजिटल भुगतान के विस्तार, व्यापारी हितों और उपभोक्ता सुविधा के बीच किस प्रकार संतुलन बनाया जाता है।


