
श्रीनगर में NC विधायकों की बगावत! फारूक अब्दुल्ला से मुलाकात के बाद क्या बदलेगा सियासी खेल?
जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के मंत्रिमंडल विस्तार के महज चार दिन बाद सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। 27 अक्टूबर 2026 को हुए मंत्रिमंडल विस्तार का उद्देश्य सरकार को मजबूत बनाना और वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारी देना था।

LIVE 24 TV | राष्ट्रीय समाचार | 31 अक्टूबर 2026
श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर की राजनीति में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार के बाद सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर असंतोष बढ़ता दिखाई दे रहा है। पार्टी के 24 विधायकों का एक समूह नेतृत्व के फैसलों पर सवाल उठाते हुए एकजुट हुआ है। नाराज विधायकों ने मुख्यमंत्री के सलाहकार नासिर असलम वानी और कुछ वरिष्ठ मंत्रियों को पद से हटाने की मांग की है।
शुक्रवार, 30 अक्टूबर को श्रीनगर में हुई बैठक में 18 विधायक व्यक्तिगत रूप से शामिल हुए, जबकि छह अन्य ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए समर्थन दिया। इस घटनाक्रम ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर नेतृत्व, मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर नई बहस छेड़ दी है। नाराज विधायकों का कहना है कि उनका उद्देश्य पार्टी को कमजोर करना नहीं, बल्कि सरकार के कामकाज में पारदर्शिता लाना और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की भूमिका मजबूत करना है। समूह ने अपनी मांगें मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और पार्टी अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला के सामने रखने का निर्णय लिया है।
मंत्रिमंडल विस्तार के चार दिन बाद क्यों बढ़ी नाराजगी?
जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के मंत्रिमंडल विस्तार के महज चार दिन बाद सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। 27 अक्टूबर 2026 को हुए मंत्रिमंडल विस्तार का उद्देश्य सरकार को मजबूत बनाना और वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारी देना था, लेकिन इस फैसले ने पार्टी के कई विधायकों की नाराजगी बढ़ा दी।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने चार नए मंत्रियों—अली मोहम्मद सागर, शमीमा फिरदौस, मीर सैफुल्लाह और अल्ताफ अहमद वानी उर्फ अल्ताफ कालू—को मंत्रिमंडल में शामिल किया। वहीं, निर्दलीय विधायक और मंत्री सतीश शर्मा को मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया। इस बदलाव के बाद मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या नौ हो गई।
नाराजगी की सबसे बड़ी वजह उन वरिष्ठ विधायकों को मंत्री पद नहीं मिलना बताया जा रहा है, जो लंबे समय से पार्टी के लिए काम कर रहे हैं। ईदगाह से विधायक मुबारक गुल के समर्थकों ने पार्टी मुख्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। वहीं, विधायक अब्दुल मजीद लर्मी ने भी मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने पर निराशा जताई। कुछ नेताओं ने चयन प्रक्रिया और पार्टी नेतृत्व के फैसलों पर सवाल उठाए हैं।
मंत्रिमंडल विस्तार के बाद क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को लेकर भी विवाद बढ़ा है। चारों नए मंत्री कश्मीर घाटी से हैं, जबकि जम्मू क्षेत्र का प्रतिनिधित्व केवल दो मंत्रियों तक सीमित रह गया है। विपक्षी भाजपा ने भी इस असंतुलन पर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने मंत्रिमंडल में हुए बदलाव का स्वागत किया है। हालांकि, पार्टी के भीतर उभरती नाराजगी नेतृत्व के लिए चुनौती बन सकती है।
श्रीनगर में तीन घंटे चली विधायकों की बैठक
जम्मू-कश्मीर की सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस में मंत्रिमंडल विस्तार के बाद शुरू हुई नाराजगी अब खुलकर सामने आने लगी है। श्रीनगर में पार्टी के असंतुष्ट विधायकों ने एक महत्वपूर्ण बैठक की, जिसमें सरकार की कार्यप्रणाली, मंत्रियों की जवाबदेही और संगठन के भीतर विधायकों की भूमिका को लेकर गंभीर चर्चा हुई।
जानकारी के मुताबिक, यह बैठक लोलाब विधानसभा क्षेत्र के विधायक कैसर जमशेद लोन के आवास पर आयोजित की गई। करीब तीन घंटे तक चली बैठक में कश्मीर घाटी और जम्मू क्षेत्र के कई विधायकों ने हिस्सा लिया। बैठक का मुख्य उद्देश्य मंत्रिमंडल विस्तार के बाद पैदा हुए असंतोष को पार्टी नेतृत्व तक पहुंचाना और विधायकों की मांगों पर साझा रणनीति तैयार करना बताया जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, बैठक में शामिल नेताओं ने इस बात पर चिंता जताई कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को सरकार के महत्वपूर्ण प्रशासनिक और नीतिगत फैसलों में पर्याप्त भागीदारी नहीं मिल रही है। कुछ विधायकों ने आरोप लगाया कि मंत्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ समन्वय की कमी के कारण उनके विधानसभा क्षेत्रों से जुड़े विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं। बैठक में संगठन के भीतर आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करने, विधायकों की शिकायतों के समाधान और सरकार तथा संगठन के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई।
बताया जा रहा है कि असंतुष्ट विधायक अपनी मांगों को लेकर पार्टी अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला से मुलाकात करने की तैयारी में हैं। उनका उद्देश्य नेतृत्व के सामने अपनी समस्याएं रखना और समाधान की मांग करना है। हालांकि, अभी तक इन विधायकों ने पार्टी छोड़ने या सरकार से समर्थन वापस लेने की कोई औपचारिक घोषणा नहीं की है। ऐसे में इस बैठक को फिलहाल पार्टी के भीतर सुधार की मांग के रूप में देखा जा रहा है।
कुछ मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, विधायकों ने अपनी मांगों का ज्ञापन तैयार किया है। इनमें मंत्रिमंडल की समीक्षा, निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता और पार्टी संगठन में सुधार की मांग शामिल है। वहीं, बैठक में शामिल नेताओं की संख्या को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में 18 से 24 तक का उल्लेख है।
नाराज विधायकों की चार प्रमुख मांगें क्या हैं?
सूत्रों के अनुसार, बैठक में विधायकों ने सरकार और संगठन में बदलाव के लिए चार प्रमुख मांगें रखी हैं।
1. मुख्यमंत्री के सलाहकार को हटाया जाए: नाराज विधायकों ने उमर अब्दुल्ला के सलाहकार नासिर असलम वानी को पद से हटाने की मांग की है। उनका आरोप है कि सलाहकार की भूमिका और निर्णय लेने की प्रक्रिया से कई निर्वाचित प्रतिनिधि असंतुष्ट हैं।
2. उपमुख्यमंत्री सहित कुछ मंत्रियों को हटाया जाए: रिपोर्टों के अनुसार, उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी को हटाने की मांग भी उठी है। समूह उन मंत्रियों को बदलना चाहता है जो सरकार गठन के समय से पद पर हैं।
3. दो साल पूरे कर चुके मंत्रियों की जगह नए चेहरों को मौका मिले: विधायकों का कहना है कि मंत्रिमंडल में समय-समय पर बदलाव होने चाहिए, ताकि दूसरे जनप्रतिनिधियों को भी सरकार में काम करने का अवसर मिले।
4. मंत्रिमंडल का व्यापक पुनर्गठन हो: समूह ने मंत्रियों की नियुक्ति में पारदर्शिता, विधायकों से परामर्श और पार्टी के चुनावी घोषणापत्र को लागू करने के लिए स्पष्ट कार्ययोजना बनाने की मांग की है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि चार दिन पहले बने चार नए मंत्रियों को हटाने की बात कही गई है, लेकिन अन्य रिपोर्टों के अनुसार मुख्य मांग अक्टूबर 2024 से पद पर बने पुराने मंत्रियों को बदलने की है। फिलहाल सभी नए मंत्रियों को हटाने की मांग की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
फारूक अब्दुल्ला से मिलकर मांगें रखेंगे विधायक
जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के मंत्रिमंडल विस्तार के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर बढ़ती नाराजगी अब पार्टी नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती बनती दिखाई दे रही है। असंतुष्ट विधायकों ने अपनी शिकायतों और मांगों को सीधे पार्टी अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के सामने रखने की रणनीति तैयार की है। इसके लिए गुरेज विधानसभा क्षेत्र से विधायक नजीर अहमद गुरेजी की अध्यक्षता में एक समिति गठित किए जाने की जानकारी सामने आई है। बताया जा रहा है कि यह समिति नाराज विधायकों की ओर से पार्टी नेतृत्व से मुलाकात करेगी और संगठन तथा सरकार की कार्यप्रणाली से संबंधित शिकायतों को सामने रखेगी।
विधायकों की प्रमुख मांगों में सरकार के महत्वपूर्ण फैसलों में निर्वाचित प्रतिनिधियों की भागीदारी बढ़ाना, मंत्रियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना और संगठन में आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करना शामिल बताया जा रहा है। इसके अलावा मंत्रिमंडल विस्तार में क्षेत्रीय संतुलन और वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी के मुद्दे भी उठाए जा सकते हैं। असंतुष्ट विधायकों का कहना है कि उनका उद्देश्य पार्टी में विभाजन पैदा करना या सरकार को अस्थिर करना नहीं है। वे बातचीत के माध्यम से अपनी समस्याओं का समाधान चाहते हैं, ताकि जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार और विधायकों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो सके।
इस पूरे घटनाक्रम में अब सबसे महत्वपूर्ण भूमिका डॉ. फारूक अब्दुल्ला की मानी जा रही है। उनके सामने एक तरफ मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के मंत्रिमंडल संबंधी फैसलों का समर्थन करने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ नाराज विधायकों को विश्वास में लेकर पार्टी की एकजुटता बनाए रखने की जिम्मेदारी भी है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, विधायकों ने मुख्यमंत्री के सलाहकार को हटाने और मंत्रिमंडल में बदलाव की मांग भी उठाई है। हालांकि, इन मांगों पर पार्टी नेतृत्व का अंतिम फैसला सामने नहीं आया है।
मुबारक गुल को महासचिव पद से हटाया
जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के मंत्रिमंडल विस्तार के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर राजनीतिक असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है। अब पार्टी के वरिष्ठ नेता और ईदगाह विधानसभा क्षेत्र से विधायक मुबारक गुल को महासचिव पद से हटाए जाने के फैसले ने विवाद को और बढ़ा दिया है। इस निर्णय के विरोध में उनके समर्थकों ने शुक्रवार, 30 अक्टूबर की रात श्रीनगर में मशाल जुलूस निकालकर नाराजगी जताई।
दरअसल, 27 अक्टूबर को मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान मुबारक गुल को मंत्री नहीं बनाया गया था। इससे उनके समर्थकों में असंतोष फैल गया था। नाराजगी दूर करने के लिए पार्टी अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने गुल को नेशनल कॉन्फ्रेंस का महासचिव नियुक्त किया था। लेकिन महज तीन दिन बाद ही पार्टी नेतृत्व ने अपना फैसला बदल दिया।
30 अक्टूबर को जारी नए आदेश में फारूक अब्दुल्ला ने वरिष्ठ नेता और मंत्री अली मोहम्मद सागर को अगले आदेश तक महासचिव पद की जिम्मेदारी संभालते रहने का निर्देश दिया। इस फैसले के बाद मुबारक गुल की संगठन में भूमिका को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, मुबारक गुल के समर्थक उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल करने की मांग कर रहे हैं। श्रीनगर के ईदगाह इलाके में निकाले गए मशाल जुलूस के दौरान प्रदर्शनकारियों ने पार्टी नेतृत्व के फैसले पर विरोध जताया।
इस बीच मुबारक गुल ने घोषणा की है कि वह 4 नवंबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पार्टी के भीतर चल रहे घटनाक्रम पर अपनी बात रखेंगे। उनके इस बयान के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस की आंतरिक राजनीति को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। मंत्रिमंडल विस्तार से शुरू हुआ विवाद अब पार्टी संगठन तक पहुंच चुका है। नाराज विधायकों की बैठक और मुबारक गुल के समर्थकों के प्रदर्शन के बीच फारूक अब्दुल्ला के सामने संगठन में एकजुटता बनाए रखने की चुनौती है।
सांसद आगा रुहुल्ला की नाराजगी ने बढ़ाई चुनौती, 3 नवंबर को इस्तीफे का ऐलान
जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के सामने राजनीतिक चुनौतियां लगातार बढ़ती जा रही हैं। मंत्रिमंडल विस्तार के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायकों की नाराजगी के बीच अब श्रीनगर से लोकसभा सांसद आगा सैयद रुहुल्ला मेहदी ने पार्टी और संसद की सदस्यता से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी है। उनके इस फैसले से पार्टी के भीतर चल रहा असंतोष और चर्चा में आ गया है।
आगा रुहुल्ला ने स्पष्ट किया है कि वह 3 नवंबर 2026 को नेशनल कॉन्फ्रेंस और श्रीनगर लोकसभा सीट से इस्तीफा देंगे। इसी दिन उनके पिता आगा सैयद मेहदी की पुण्यतिथि भी है। उन्होंने बडगाम के बेहिश्त-ए-जहरा पार्क में एक सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित करने की घोषणा की है, जिसमें समर्थकों को शामिल होने का आमंत्रण दिया गया है।
रुहुल्ला लंबे समय से मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और पार्टी नेतृत्व की नीतियों पर सवाल उठाते रहे हैं। उनकी मुख्य नाराजगी जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 की बहाली, आरक्षण नीति और चुनाव के दौरान किए गए वादों को लेकर है। उनका आरोप है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस सत्ता में आने के बाद अपने प्रमुख चुनावी वादों को पूरा करने की दिशा में अपेक्षित कदम नहीं उठा रही है।
उन्होंने पार्टी नेतृत्व पर जनता की अपेक्षाओं की अनदेखी करने का भी आरोप लगाया है। हालांकि, ये उनके राजनीतिक आरोप हैं और पार्टी नेतृत्व से असहमति का हिस्सा हैंरुहुल्ला का यह फैसला ऐसे समय सामने आया है, जब मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर नेशनल कॉन्फ्रेंस के कई विधायक पहले से असंतुष्ट हैं। यदि आगा रुहुल्ला औपचारिक रूप से इस्तीफा देते हैं, तो श्रीनगर लोकसभा सीट पर उपचुनाव की स्थिति बन सकती है। साथ ही पार्टी को संगठनात्मक स्तर पर नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
रुहुल्ला का यह फैसला ऐसे समय सामने आया है, जब मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर नेशनल कॉन्फ्रेंस के कई विधायक पहले से असंतुष्ट हैं। यदि आगा रुहुल्ला औपचारिक रूप से इस्तीफा देते हैं, तो श्रीनगर लोकसभा सीट पर उपचुनाव की स्थिति बन सकती है। साथ ही पार्टी को संगठनात्मक स्तर पर नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
क्या उमर अब्दुल्ला सरकार पर मंडरा रहा है संकट?
जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के मंत्रिमंडल विस्तार के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर बढ़ती नाराजगी ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। पार्टी के करीब 24 विधायकों के असंतुष्ट होने की खबरों के बाद सवाल उठने लगा है कि क्या उमर अब्दुल्ला सरकार की स्थिरता पर संकट मंडरा रहा है या यह विवाद केवल संगठन के भीतर असहमति तक सीमित रहेगा।
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में कुल 90 निर्वाचित सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए 46 विधायकों का समर्थन आवश्यक है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के पास 41 विधायक हैं। इसके अलावा कांग्रेस के छह, निर्दलीय और अन्य सहयोगी विधायकों के समर्थन से सरकार के पास करीब 53 विधायकों का संख्याबल बताया गया है। यानी मौजूदा समर्थन के आधार पर सरकार बहुमत की स्थिति में है।
हालांकि, मंत्रिमंडल विस्तार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ा है। रिपोर्टों के अनुसार, श्रीनगर में हुई बैठक में 18 विधायक व्यक्तिगत रूप से शामिल हुए, जबकि छह अन्य ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से समर्थन जताया। इन विधायकों ने मंत्रियों की जवाबदेही, संगठन में आंतरिक लोकतंत्र और महत्वपूर्ण फैसलों में अपनी भागीदारी बढ़ाने की मांग की है।
राजनीतिक दृष्टि से यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नाराज विधायकों की संख्या पार्टी के कुल विधायकों के आधे से अधिक बताई जा रही है। हालांकि, नाराजगी का अर्थ सरकार से समर्थन वापस लेना नहीं है। अभी तक असंतुष्ट विधायकों ने अलग राजनीतिक समूह बनाने, मुख्यमंत्री के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने या औपचारिक रूप से समर्थन वापस लेने की घोषणा नहीं की है।
ऐसे में फिलहाल उमर अब्दुल्ला सरकार पर तत्काल बहुमत खोने का संकट दिखाई नहीं देता, लेकिन पार्टी के भीतर बढ़ता असंतोष नेतृत्व के लिए गंभीर चुनौती जरूर बन गया है। अब सबकी नजरें फारूक अब्दुल्ला पर हैं। क्या वह नाराज विधायकों को मनाकर पार्टी में एकजुटता बनाए रखेंगे या यह विवाद आने वाले दिनों में और गहराएगा?
फिलहाल नेशनल कॉन्फ्रेंस के अंदर उठी यह नाराजगी जम्मू-कश्मीर की राजनीति में चर्चा का प्रमुख विषय बनी हुई है। अब देखना होगा कि फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला बातचीत से विवाद सुलझाते हैं या मंत्रिमंडल में एक बार फिर बदलाव करना पड़ता है।




